विधानसभा चुनावः असमंजस में झूलती सियासत।

विधानसभा चुनावः असमंजस में झूलती सियासत।

गोपेश्वर:-05 अगस्त 2026
रिपोर्ट:-रजपाल बिष्ट

उत्तराखंड राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर राजनीतिक दलों की कदम ताल के बीच प्रत्याशियों को लेकर असमंजस के हालात बने हुए हैं। इसके चलते दावेदार चुनावी तैयारियों में तेजी नहीं दिखा पा रहे हैं। यह स्थिति तमाम दावेदारों के लिए चिंता का सबब बनती जा रही है।

दरअसल विधानसभा चुनाव को लेकर मौजूदा दौर में सत्तारूढ भाजपा के साथ ही कांग्रेस भी जोरदार तैयारियों में जुटे हुए हैं। मौजूदा दौर में उत्तराखंड क्रांति दल भी चुनावी तैयारियों को लेकर काफी सक्रिय हो चला है। ऐसे हालातों में भाजपा तथा कांग्रेस के दावेदार तैयारियों को लेकर असमंजस के हालात में दिखाई दे रहे हैं। हालांकि कतिपय दावेदार तैयारियों को लेकर आम जनता के बीच अपनी मौजूदगी दिखाने के लिए जनसंपर्क में जुटे तो हैं किंतु उनके विरोधी उनकी सक्रियता को लेकर सवाल भी खड़े कर रहे हैं। इस तरह के हालातों के चलते आम लोगों में दावेदारों की दावेदारी को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है।

भाजपा में सिटिंग एमएलए के साथ ही अन्य तमाम दावेदार भी चुनावी तैयारियों को लेकर सक्रिय हो चले है। इसके बावजूद दावेदारों के विरोध में भी उनके मुकाबले कहीं पीछे नहीं दिखाई दे रहे हैं। यानी एक दूसरे की काट के लिए तमाम कार्ड चलाए जा रहे हैं। इस तरह के हालातों ने आम लोगों को ऊहापोह की स्थिति में ला खड़ा कर दिया है। हालात इस तरह बंया कर रहे हैं कि मंत्री से लेकर विधायक और अन्य दावेदार अपनी उम्मीदवारी का पक्का भरोसा नहीं दिला पा रहे हैं। इसके चलते दावेदारों की सक्रियता अनिश्चय के भंवर में फंसती जा रही है। भाजपाई दावेदारों को तो अब पार्टी के आकाओं पर भी भरोसा बना है। आकाओं की कृपा दृष्टि पर ही दावेदारों का भविष्य निर्भर करेगा। फिर भी दावेदारों के इस बात की उम्मीद बनी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर अंत समय में टिकट मिलने पर वे अपनी चुनावी वैतरणी को पार कर जाएंगे।

भाजपा में भी कई लोग उम्र दराज होने के बाद सियासी सक्रियता का प्रदर्शन कर रहे हैं। यानी उम्र दराज लोगों ने भी सियासी पारी खेलने के लिए उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं। टिकट वितरण तक कौन सा फार्मुला अपनाया जाता है। इस पर भी दावेदारों का भविष्य निर्भर करेगा। मौजूदा दौर में भाजपा के तमाम दावेदार अपनी दावेदारी को लेकर आश्वस्त भी नजर आ रहे है किंतु अंततः पार्टी नेतृत्व पर ही सबकी निगाहें गढ़ी हैं। कई दावेदार तो वर्षों से अपनी दावेदारी जता रहे हैं किंतु उन्हें अब तक सफलता नहीं मिल पाई है। अबकी बार ऐसे दावेदारों को उम्मीदें बनी हैं। मौजूदा दौर में भाजपा में दावेदारों की बढ़ती भीड़ के बीच टिकट पाने के लिए भी रणनीति तैयार करने में दावेदार पीछे नहीं दिखाई दे रहे हैं। इसके लिए डू-एंड-डाई का फार्मुला अपनाया जा रहा है।

राज्य की प्रमुख विपक्षी कांग्रेस में भी दावेदारी के लिए सक्रियता कम नहीं है। कांग्रेस में भी दावेदारों की लंबी फेहरिस्त देखने को मिल रही है। यही वजह है कि एक दूसरे को पछाडने के लिए कांग्रेसी दावेदार कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे है। हालांकि 2017 से पार्टी सत्ता में आने के लिए लगातार जद्दोजहद तो कर रही है किंतु अभी तक उसे वनवास ही झेलना पड़ रहा है। मौजूदा साल में तो कांग्रेस भी चुनावी तैयारियों को लेकर काफी सक्रियता से काम कर रही है। उत्तराखंड की सियासत में पेठ जमाने के लिए सक्रियता का प्रदर्शन तो किया जा रहा है किंतु अब भी भाजपा का पीछा करने के लिए अनुशासित होकर काम करने की दरकार बनी हुई है। इस साल चुनावी तैयारियों के लिहाज से पार्टी ने रोजगार के लिए झटपटाते युवाओं पर फोकस करना शुरू कर दिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के देहरादून में छात्रों की गूंज कार्यक्रम को इसी रूप में देखा जा रहा है। टिकट के दावेदारों ने भी लगातार पराजित होते जा रहे दावेदारों को निशाने पर लेना शुरू कर दिया है। इसके चलते कहीं-कहीं तो उल्टे सुल्टे बयान पार्टी के रणनीतिकारों को हैरान परेशान कर रहे हैं।

भाजपा ने तो कांग्रेस के मुख्यमंत्री के पद के दावेदारों को लेकर ही निशाने साधने शुरू कर दिए हैं। ऐसा नहीं है कि भाजपा में सीएम दावेदारों को लेकर भी अंदरूनी तौर पर एक दूसरे को निपटाने की रणनीति पर काम किया जा रहा है किंतु भाजपा में दावेदार खुले रूप में अपनी सक्रियता का प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। यही नहीं जो लोग मंत्री पद नहीं पा सके वे भी अंदर ही अंदर कुपित तो हैं किंतु अपनी भावना का इजहार नहीं कर पा रहे हैं। बावजूद इसके कांग्रेसी दावेदार भी अपनी सक्रियता को बनाते हुए भाजपा की घेराबंदी में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। अलबत्ता टिकट को लेकर गारंटी न मिलने के कारण दावेदारों की परेशानियां भी कम होती नहीं दिखाई दे रही है। कांग्रेस की राजनीति में दखल रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस जिताऊ उम्मीदवारों पर फोकस करने में लगी है। इसके बावजूद कतिपय दावेदार एन वक्त पर रायता फैला कर पार्टी की रणनीति का ही बेडागर्क करने से परहेज नहीं कर रहे हैं। फिर भी सियायत में दावेदारों ने उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं। अब देखना यह है कि कांग्रेसी दावेदार अपने मिशन में कामयाबी मिलती है अथवा नहीं। यानि, दावेदारों ने अपनी सक्रियता नहीं छोड़ी है। हालात भले ही टिकट के लिए असमंजस के बने हुए हैं।

उक्रांद राज्य में भाजपा तथा कांग्रेस के अलावा एक विकल्प देने का भरोसा दे तो रहा है किंतु उसे अभी जनता का विश्वास अर्जित करने को लेकर सधे कदमों के साथ आगे बढ़ना होगा। राज्य बनने के बाद उक्रांद लगातार हासिए की स्थिति में रहा है। मौजूदा चुनावी तैयारियों के साल में उक्रांद ने भी दावेदारी को लेकर तमाम दावेदार सक्रियता का प्रदर्शन कर रहे हैं। तमाम विधानसभा क्षेत्रों में उक्रांद के दावेदार इस बार काफी सक्रिय होकर भाजपा तथा कांग्रेस की घेराबंदी में जुटे हुए हैं। इससे पूर्व चुनाव के दौरान उक्रांद सांकेतिक तौर पर ही किसी उम्मीदवार को मैदान उतारता रहा है। इस बार राजनीतिक परिस्थितियां उक्रांद की सक्रियता को एक भरोसे के रूप में देख रही है। पहाड़ और पहाड़ी के नारे पर चल रहे उक्रांद के लिए मैदानी इलाके भरोसा नहीं दिखा पा रहे हैं। यानि उक्रांद को केवल पहाड़ों में ही अपनी गुंजाइश दिखाई दे रही है। मैदानी इलाके उक्रांद को भरोसा नहीं दे पा रहे हैं। यह अलग बात है कि मैदानी इलाकों में पहाड़ के लोगों की मजबूत स्थिति के चलते उक्रांद कुछ सीटों पर चुनौती देने की स्थिति में आ खड़ा हो सकता है। इस बार उक्रांद ने कई-कई सीटों पर दावेदारों की फेहरिस्त भी लंबी होती दिखाई दे रही है। ऐसे में प्रत्याशियों का चयन करना दल के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। यानि जो भी दावेदार उक्रांद से दावेदारी को लेकर सक्रियता का प्रदर्शन कर रहा है वह भी उम्मीदवारी को लेकर असमंजस की स्थिति में है।

उक्रांद के इतर अन्य संगठनों और निर्दलियों ने भी इस बीच सक्रियता का प्रदर्शन कर सत्तारूढ दल की घेराबंदी करनी शुरू कर दी है। फिर भी भविष्य को लेकर इस तरह के दावेदार असमंजस के हालात में दिखाई दे रहे हैं। उत्तराखंड में भाजपा एक तरह से सभी दलों के लिए चुनौती बनी हुई है। बूथ लेबल तक भाजपा की मजबूत पैठ अन्य दावेदारों के लिए चुनौती का सबब बनी हुई है। ऐसे में अब भाजपा के इतर वाले दलों को बूथ लेबल तक मजबूत पैठ बनाने की भी दरकार है।

सत्तारूढ भाजपा ने जिस तरह चुनावी तैयारियों को लेकर कदमताल तेज कर दी है। इसके चलते माना जा रहा है कि इस बार चुनाव अगले साल फरवरी माह में होने वाले मतदान से पूर्व इसी साल नवंबर में भी संभव है। ऐसा इसलिए कि अगले साल हरिद्वार में 14 जनवरी से अर्द्धकुंभ होने जा रहा है। अगले साल ही राज्य में जनगणना का दौर चलेगा। इसके चलते समयपूर्व चुनाव संभव हैं। इसलिए भाजपा के मुकाबले तैयारियों के लिए अन्य दलों अथवा दावेदारों को अभी से सक्रिय प्रदर्शन की चुनौती भी आ खड़ी हो गई है। भाजपा तो सत्ता पाने के बाद लगातार चुनावी मोड़ में चली जा रही है। अन्य दलों अथवा दावेदारों के लिए इस तरह की चुनौती का सामना सधे कदमों के साथ करना होगा। अब देखना है कि अनिश्चता के बीच दावेदार अपनी सक्रियता का प्रदर्शन किस तरह करते है। इस पर ही उनका सियासी भविष्य निर्भर करेगा। फिलहाल तो सियासत में तो दावेदारों की दावेदारी अनिश्चय के भंवर में फंसी है।

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