बजट नहीं है तो बंद कर देना चाहिए’ नंदा गौरा स्कीम,हाइकोर्ट की सरकार पर सख्त टिप्पणी।

बजट नहीं है तो बंद कर देना चाहिए’ नंदा गौरा स्कीम,हाइकोर्ट की सरकार पर सख्त टिप्पणी।

गैरसैंण निवासी सामाजिक कार्यकर्ता ममता नेगी द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है मामला।

नैनीताल:-24 अगस्त 2026

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य की 12वीं पास मेधावी बालिकाओं को ‘नंदा गौरा योजना’ का वित्तीय लाभ न दिए जाने के मामले पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की खंडपीठ ने राज्य सरकार और महिला सशक्तिकरण व बाल विकास विभाग से कड़े सवाल करते हुए पूछा कि, ‘आखिर अब तक पात्र बालिकाओं को योजना का लाभ क्यों नहीं दिया गया’?

सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने बेहद सख्त मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि, यदि सरकार के पास योजना संचालित करने का बजट नहीं है, तो ऐसी योजनाओं को बंद कर देना चाहिए। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित विभागों को स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं और अगली सुनवाई के लिए चार सप्ताह बाद की तिथि तय की है।

​अदालत की कार्रवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए कहा गया कि, यह मामला वर्तमान में वित्त विभाग के पास विचाराधीन है और सरकार जल्द ही इसके लिए आवश्यक बजट जारी करने वाली है। इस दलील का विरोध करते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि, यदि समय पर बजट जारी नहीं किया गया तो गरीब परिवारों की बालिकाओं की आगे की उच्च शिक्षा प्रभावित होगी. उन्होंने अदालत से गुहार लगाई कि, इस कल्याणकारी योजना का समान लाभ सभी पात्र छात्राओं को बिना किसी देरी के मिलना चाहिए, ताकि उनके शैक्षणिक भविष्य से खिलवाड़ न हो।

​गौरतलब है कि यह मामला चमोली जिले की गैरसैंण निवासी सामाजिक कार्यकर्ता ममता नेगी द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में बताया गया है कि चमोली जिले में वर्ष 2022-23 में इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली 439 बालिकाओं ने योजना के नियमानुसार वर्ष 2023 में ही अपने विद्यालय के माध्यम से सभी जरूरी दस्तावेज जमा करा दिए थे। योजना के तहत इन बालिकाओं को आगे की पढ़ाई के लिए 51-51 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि दी जानी थी। संबंधित विभाग ने सरकार से 2 करोड़ 45 लाख रुपए के बजट की मांग भी की थी। लेकिन लंबा समय बीत जाने के बाद भी प्रशासन द्वारा बजट स्वीकृत नहीं किया गया, जिससे छात्राएं अपने अधिकार से वंचित हैं।

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