हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामले में CJI की कड़ी टिप्पणी,पढ़िए पूरी सुनवाई।

हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामले में CJI की कड़ी टिप्पणी,पढ़िए पूरी सुनवाई।

नई दिल्ली-24 फरवरी 2026

सुप्रीम कोर्ट में हल्द्वानी के बनभूलपुरा स्थित रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले पर सुनवाई के दौरान रेलवे और उत्तराखण्ड सरकार ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) की पीठ के समक्ष अपना हलफनामा पेश किया। मामले में पुनर्वास, मुआवजा और भूमि स्वामित्व को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई।

रेलवे और राज्य सरकार का पक्ष⤵️

रेलवे की ओर से अदालत को बताया गया कि कुल 13 ऐसे मामले हैं जिनमें भूमि फ्रीहोल्ड श्रेणी की है और उन मामलों में मुआवजा दिए जाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके अतिरिक्त, जिन लोगों को रेलवे भूमि से हटाया गया है, उनके लिए राज्य सरकार द्वारा वैकल्पिक आवासीय व्यवस्था मुहैया कराने का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया गया है। रेलवे ने अदालत में कहा कि जिन लोगों को हटाया गया, वे सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से रह रहे थे। यह निजी भूमि नहीं बल्कि रेलवे की संपत्ति है। इसके बावजूद मानवीय आधार पर मुआवजे का प्रस्ताव दिया जा रहा है। रेलवे ने यह भी अनुरोध किया कि हटाए गए लोगों के पुनर्स्थापन की मांग वाली याचिका को खारिज किया जाए

याचिकाकर्ता का तर्क⤵️

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने अदालत में कहा कि प्रभावित लोगों की संख्या 50 हजार से अधिक है। उन्होंने दलील दी कि इनमें से बहुत कम लोग प्रधानमंत्री आवास योजना की पात्रता में आते हैं। ऐसे में शेष परिवारों के पुनर्वास की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। भूषण ने यह भी कहा कि संबंधित भूमि राज्य सरकार की है और लोग वर्षों से वहां रह रहे थे। उनका कहना था कि लंबे समय से बसे होने के कारण इन बस्तियों के नियमितिकरण पर विचार किया जाना चाहिए था और इस मामले का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी महत्वपूर्ण है।

सीजेआई की टिप्पणी⤵️

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि लोगों की संख्या 50 हजार हो सकती है, लेकिन परिवारों की संख्या उतनी नहीं होगी। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनते हुए मामले की गंभीरता को रेखांकित किया।
मामले की अगली सुनवाई में पुनर्वास, मुआवजा और भूमि स्वामित्व के कानूनी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र से जुड़े इस मामले पर पूरे प्रदेश की नजर बनी हुई है। भूषण ने कहा कि हाईकोर्ट में जनहित याचिका नदी में खनन को रोकने के लिए थी। जहां लोगों को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर रहने वाला बताया गया और फिर रेलवे ने एक्सपेंशन के नाम पर हटाया गया। भूषण ने कहा कि बगल में एक ख़ाली ज़मीन जो 30 एकड़ से ज़्यादा है, वो है। इसके पास उन्हें हटाया गया।

सीजेआई ने कहा कि आप सार्वजनिक भूमि पर ऐसे दावा कर रहे हैं। जैसे मालिकाना हक हो, जबकि अनाधिकृत तरीक़े से रह रहे थे।

सीजेआई ने एएसजी ऐश्वर्या भाटी से पूछा कि आपके सरकारी आवास देने का प्रस्ताव क्या है।

भाटी ने कहा कि तीन कैटेगरी हैं ईडब्ल्यूएस, लो कैटेगरी और सेमी लो कैटेगरी है जिसमें आवास दिया जाएगा।

सीजेआई ने कहा कि इस क्षेत्र में बेसिक सुविधा भी नहीं है। सीवेज तक नहीं है, ऐसे में हाउसिंग योजना के तहत घर लेने में क्या समस्या है।

भूषण ने कहा कि एकपक्षीय आदेश जारी हुए थे कोविड के आसपास। इसके बाद यहां अपील दाखिल हुई।

भूषण ने कहा कि तब सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही विस्तृत आदेश दिया था कि कैसे क्या होगा? सीजेआई ने भाटी से पूछा कि पीएम आवास योजना के तहत सभी परिवारों को आवास मुहैया कराना चुनौती नहीं है।

सीजेआई ने कहा कि कोई अन्य प्रस्ताव नहीं है।भाटी ने कहा कि रेलवे के पास जमीन सीमित है और बड़े पैमाने पर जमीन पर अनाधिकृत क़ब्ज़ा है। रेलवे को एक्सटेंशन भी करना है।

बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण पर CJI ने दिया यह बड़ा आदेश⤵️

सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्वास के लिए कैंप लगाने का दिया निर्देश- 31 मार्च तक 2019 की पुनर्वास नीति के तहत अब तक उठाए गए कदमों पर रिपोर्ट मांगी – साथ ही पूछा कि उक्त नीति के अनुसार किन-किन परिवारों को पुनर्वास का अधिकार प्राप्त होगा- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- , गतिरोध अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रह सकता- प्रभावित परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन करने में मदद के लिए मौके पर विशेष पुनर्वास कैंप लगाए जाएं – रेलवे की ओर से बताया गया कि परियोजना के तहत लाइन के रियलाइन्मेंट के लिए 30.65 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है- साथ ही, जिन संरचनाओं को ध्वस्त किया गया है, उनके लिए प्रत्येक प्रभावित परिवार को छह महीने की अवधि तक 2000 रुपये प्रतिमाह देने का प्रस्ताव है – मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने याचिकाकर्ताओं की आर्थिक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) की श्रेणी में आएंगे- अदालत ने कहा कि यह अत्यंत आवश्यक है कि प्रत्येक परिवार की पात्रता का निर्धारण किया जाए, बशर्ते वे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन प्रस्तुत करें – पीठ ने दोहराया कि पुनर्वास प्रक्रिया को स्पष्ट और पारदर्शी ढंग से आगे बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि पात्र परिवारों को योजना का लाभ मिल सके और परियोजना से जुड़ा गतिरोध समाप्त हो – वहीं सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि कुछ परिवार छोटे-छोटे भूखंडों के स्वामी के रूप में चिन्हित किए गए है- यदि उनकी भूमि ली जाती है तो वह विधिवत अधिग्रहण की कार्यवाही के तहत ही ली जाएगी – हालांकि, अतिक्रमणकारियों के संबंध में केंद्र की ओर से कहा गया कि वे वहीं पर पुनर्वास की मांग पर जोर नहीं दे सकते- क्योंकि उक्त भूमि बड़े पैमाने पर रेलवे विस्तार परियोजना के लिए आवश्यक है- सरकार ने यह भी बताया कि पात्र लोगों के पुनर्वास के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना लागू है, जिसके तहत याचिकाकर्ता आवेदन कर सकते हैं – अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक परिवार की पीएम आवास योजना के तहत पात्रता का निर्धारण तभी होगा जब वे योजना के तहत आवेदन प्रस्तुत करेंगे – सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिला कलेक्टर, अन्य राजस्व अधिकारी तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण मिलकर स्थल पर पुनर्वास कैंप आयोजित करें, ताकि प्रत्येक परिवार का मुखिया प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन कर सके – कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव, जिला एवं उपमंडल विधिक सेवा प्राधिकरणों के सचिव भी कैंप के दौरान स्थल पर उपस्थित रहें-राजस्व अधिकारियों को आवेदन प्रक्रिया में सक्रिय सहयोग देने का निर्देश दिया गया हैपीठ ने कहा कि वह सराहना करेगी यदि आवेदन जमा करने की प्रक्रिया 31 मार्च 2026 तक पूरी कर ली जाए- साथ ही, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि जब तक सभी पात्र कब्जाधारी आवेदन नहीं कर लेते, तब तक कैंप आयोजित किए जाते रहें।

अदालत ने दोहराया कि परियोजना से जुड़ा गतिरोध लंबे समय तक नहीं चल सकता और पुनर्वास की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाना आवश्यक है हल्द्वानी मे रेलवे की जमीन पर अवैध कब्जे को हटाने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा था – ये मामला करीब 50 हज़ार की आबादी से जुड़ा है फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा रखी है- पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड प्रशासन से पूछा था कि राज्य सरकार के पास इन बस्तियों में रहने वाले लोगों को दूसरी जगह बसाने के लिए क्या मास्टर प्लान है।

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