उत्तराखंड का हिमालयी महाकुंभ कही जाने वाली नंदा देवी राजजात स्थगित,अब यह ऐतिहासिक और धार्मिक यात्रा वर्ष 2027 में होगी आयोजित।

उत्तराखंड का हिमालयी महाकुंभ कही जाने वाली नंदा देवी राजजात स्थगित,अब यह ऐतिहासिक और धार्मिक यात्रा वर्ष 2027 में होगी आयोजित।

कर्णप्रयाग (चमोली)- 18 जनवरी 2026

उत्तराखंड का हिमालयी महाकुंभ कही जाने वाली नंदा देवी राजजात इस वर्ष आयोजित नहीं होगी। श्रीनंदा देवी राजजात समिति के अध्यक्ष राकेश कुंवर व महासचिव भुवन नोटियाल ने कर्णप्रयाग में प्रेसवार्ता कर बताया कि हिमालयी क्षेत्र में जरूरी कार्य समय पर पूरे नहीं हो पाए हैं। इसी कारण समिति ने राजजात को स्थगित करने का निर्णय लिया है। अब यह ऐतिहासिक और धार्मिक यात्रा वर्ष 2027 में आयोजित की जाएगी। नंदा देवी राजजात हर 12 वर्ष में निकलने वाली लगभग 280 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा है।

श्री नंदादेवी राजजात यात्रा समिति द्वारा कर्णप्रयाग में आयोजित बैठक में राजजात यात्रा को वर्ष 2026 के बजाय वर्ष 2027 में आयोजित करने का निर्णय लिया गया है।श्री नंदादेवी राजजात यात्रा समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर राकेश कुंवर ने बताया कि 23 जनवरी को मनौती का कार्यक्रम विधिवत रूप से सम्पन्न किया जाएगा, लेकिन पंचांग के अनुसार इस वर्ष यात्रा 19 व 20 सितंबर को उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पहुँचती है। इस दौरान क्षेत्र में भारी बर्फबारी व प्रतिकूल मौसम की संभावना रहती है। साथ ही निर्जन पड़ावों पर अभी आवश्यक कार्य पूरे न होने के कारण यात्रा की सुरक्षा एवं व्यवस्थाएं चुनौतीपूर्ण हो सकती थीं। इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समिति ने सर्वसम्मति से राजजात यात्रा को 2026 के स्थान पर 2027 में आयोजित करने का निर्णय लिया है।राजजात यात्रा को 2026 के बजाय 2027 में आयोजित किए जाने के निर्णय के बाद समिति के महासचिव भुवन नौटियाल ने बताया कि यात्रा से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव शासन को भेजे जाएंगे। उन्होंने कहा कि यह पहला अवसर है जब राजजात यात्रा के लिए शुभ मुहूर्त के अनुरूप विधिवत संकल्प लिया गया है। वर्ष 2026 में प्रस्तावित यात्रा व्यवस्थागत दृष्टि से चिंताजनक थी, क्योंकि राजजात यात्रा कभी भी ठीक 12 वर्षों के अंतराल में आयोजित नहीं हो पाई है और विषम परिस्थितियों में यात्रा कराना जोखिमपूर्ण होता।

नंदा राजजात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं,बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा मानी जाती है। इसे हिमालय की सबसे लंबी और कठिन पैदल धार्मिक यात्रा भी कहा जाता है। यह यात्रा मां नंदा देवी को उनके मायके गढ़वाल से ससुराल होमकुंड तक विदा करने की परंपरा का प्रतीक है। स्थानीय लोकमान्यता में मां नंदा देवी को भगवान शिव की अर्धांगिनी और हिमालय की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।यह यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं की साझा आस्था का प्रतीक है। इतिहासकारों के अनुसार, इस यात्रा ने सदियों से पहाड़ी समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया है।

यात्रा का जीवंत प्रतीक नंदा राजजात की सबसे अनोखी और विशिष्ट परंपरा है चार सींग वाला खाडू है। मान्यता है कि इसके जन्म के साथ ही राजजात का समय तय हो जाता है.यही खाडू यात्रा का अग्रदूत होता है,इसे मां नंदा का प्रतिनिधि माना जाता है।

धार्मिक दृष्टि से मां नंदा देवी की विदाई की प्रतीक यात्रा शिव-शक्ति परंपरा से जुड़ी हिमालयी लोकदेवताओं की सामूहिक उपासना का प्रतीक भी मानी जाती है। वहीं, सांस्कृतिक दृष्टि से लोकगीत, झोड़ा-छपेली, जागर
पारंपरिक वेशभूषा, सामूहिक भंडारे और सेवा परंपरा के वाहक के साथ यह यात्रा उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का चलता-फिरता संग्रहालय मानी जाती है। वर्ष 2014 की राजजात में लगभग 20 लाख से अधिक श्रद्धालु विभिन्न चरणों में जुड़े थे.देश-विदेश से तीर्थयात्री, शोधकर्ता और पर्यटक भी पहुंचे। वर्ष 2027 में अनुमान है कि 30 से 50 लाख श्रद्धालुओं की भागीदारी होगी।स्थानीय ग्रामीणों, स्वयंसेवी संस्थाओं और प्रशासन की व्यापक सहभागिता यात्रा में रहती है। यह यात्रा जनसंख्या और भूगोल के लिहाज़ से चलता-फिरता महाकुंभ कही जाती है।

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