उत्तराखंड का वन विभाग अपनी ही योजना महिला नर्सरी को लगा पलीता लगाने में,खुद वन मंत्री ने किया खुलासा।

उत्तराखंड का वन विभाग अपनी ही योजना महिला नर्सरी को लगा पलीता लगाने में,खुद वन मंत्री ने किया खुलासा।

देहरादून-26 मार्च 2026

महिला नर्सरियों के कॉन्सेप्ट को शुरू करने वाला उत्तराखंड का वन विभाग खुद इसे पलीता लगाने में लगा है। वन मंत्री की एक चिट्ठी ने इस बात का खुलासा किया है, जिसमें महिला नर्सरियों से ही वन विभाग द्वारा परहेज करने की बात लिखी गई है। स्थिति यह है कि हर साल लाखों पेड़ लगाने वाला वन विभाग खुद इन नर्सरियों से पेड़ खरीदने को तैयार नहीं है।

उत्तराखंड में महिला सशक्तिकरण और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई महिला नर्सरी योजना शुरू की गई थी,लेकिन अब समस्या यह है कि जिस वन विभाग ने इस अवधारणा को जमीन पर उतारा,अब वहीं इससे दूरी बनाता नजर आ रहा है। हालात ऐसे हैं कि लाखों पौधे लगाने वाला वन विभाग खुद इन महिला नर्सरियों से एक भी पौधा खरीदने को तैयार नहीं है।

आठ वन प्रभागों में शुरू हुई थी महिला नर्सरी⤵️

दरअसल, पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए वन विभाग ने राज्य के आठ वन प्रभागों नरेंद्र नगर, टिहरी, बदरीनाथ,अलकनंदा, टौंस,पिथौरागढ़, चंपावत और अल्मोड़ा में महिला नर्सरियों की शुरुआत की थी। इस पहल का उद्देश्य था कि स्थानीय महिलाओं को नर्सरी प्रबंधन से जोड़ा जाए, जिससे उन्हें रोजगार के अवसर मिलें और वे आत्मनिर्भर बन सकें। शुरुआत में इस योजना को एक सकारात्मक कदम माना गया, लेकिन समय के साथ इसकी जमीनी हकीकत निराशाजनक सामने आई।

वन मंत्री ने भी की नाराजगी जाहिर⤵️

वन विभाग ने इन प्रभागों में कुल 12 महिला नर्सरियों की स्थापना तो कर दी, लेकिन इनसे पौधे खरीदने में कोई रुचि नहीं दिखाई. उत्तराखंड वन सांख्यिकी रिपोर्ट के अनुसार, इन नर्सरियों में कुल 1,52,570 पौधे उपलब्ध थे, इसके बावजूद वन विभाग ने एक भी पौधा यहां से नहीं खरीदा। दूसरी ओर अन्य विभागों ने इन महिला नर्सरियों से 26,870 पौधों की खरीद जरूर की, जिससे यह साफ हो जाता है कि समस्या पौधों की गुणवत्ता या उपलब्धता की नहीं, बल्कि विभागीय सोच और प्राथमिकता की है. इस पूरे मामले पर उत्तराखंड के वन मंत्री ने भी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने एक पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया कि महिला नर्सरियों को लेकर विभाग का रवैया संतोषजनक नहीं है और यह स्थिति योजना की मूल भावना के खिलाफ है। मंत्री ने यह भी कहा कि जब विभाग खुद इन नर्सरियों पर भरोसा नहीं करेगा, तो अन्य एजेंसियों और लोगों के बीच इसका सकारात्मक संदेश कैसे जाएगा।

निजी नर्सरियों से खरीदे जा रहे पौधे⤵️

उत्तराखंड में हर साल वृहद स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाया जाता है, जिसमें एक करोड़ से अधिक पौधे लगाए जाते हैं. इस अभियान में वन विभाग की भूमिका सबसे अहम होती है,क्योंकि वह नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब इतनी बड़ी संख्या में पौधे लगाए जा रहे हैं, तो महिला नर्सरियों को इससे बाहर क्यों रखा जा रहा है? इससे यह भी संकेत मिलता है कि विभाग द्वारा बड़ी मात्रा में पौधों की खरीद निजी नर्सरियों से की जा रही है

सरकारी योजना की विश्वसनीयता हो रही प्रभावित ⤵️

निजी नर्सरियों को प्राथमिकता और महिला नर्सरियों की अनदेखी ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। इससे न केवल सरकारी योजना की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है,बल्कि उन महिलाओं के मनोबल पर भी असर पड़ रहा है,जिन्होंने इस योजना के तहत नर्सरी स्थापित की थी। यह स्थिति महिला सशक्तिकरण के प्रयासों को कमजोर करने वाली मानी जा रही है।

वन मंत्री ने अपने पत्र में इस स्थिति को महिला नर्सरी की अवधारणा को हतोत्साहित करने वाला बताया है। साथ ही उन्होंने वन विभाग को स्पष्ट निर्देश भी जारी किए हैं कि पौधारोपण कार्यक्रमों के तहत महिला नर्सरियों से अनुबंध के आधार पर पौधे खरीदे जाएं। इसके अलावा हर वन प्रभाग में कम से कम एक नई महिला नर्सरी स्थापित करने का भी निर्देश दिया गया है। उत्तराखंड सरकार ने यह भी तय किया है कि महिला नर्सरियों में तैयार पौधों की दरें निर्धारित की जाएं,ताकि खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी प्रकार का भेदभाव न हो। इसके साथ ही ग्रामीण महिलाओं के लिए बड़े स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की बात भी कही गई है, जिससे वे नर्सरी प्रबंधन में और अधिक दक्ष बन सकें।

यह पूरा मामला उत्तराखंड में योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति को उजागर करता है। कागजों पर योजनाएं बनाना और उन्हें लागू करना अलग बात है, लेकिन उन्हें प्रभावी ढंग से जमीन पर उतारना सबसे बड़ी चुनौती होती है। महिला नर्सरी योजना के साथ भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। अगर समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह योजना पूरी तरह से विफल हो सकती है। वहीं,यदि वन विभाग अपने रवैये में बदलाव लाता है और महिला नर्सरियों को प्राथमिकता देता है, तो यह पहल न केवल महिलाओं के लिए रोजगार का मजबूत साधन बन सकती है, बल्कि राज्य के पर्यावरण संरक्षण प्रयासों को भी नई दिशा दे सकती है। स्पष्ट है कि अब गेंद वन विभाग के पाले में है या तो वह अपनी ही बनाई योजना को मजबूती दे,या फिर इसे केवल कागजी उपलब्धि बनाकर छोड़ दे।

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