नैनीताल हाईकोर्ट ने की IPS नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर सुनवाई,दोनों को कैट जाने का निर्देश।

नैनीताल हाईकोर्ट ने की IPS नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर सुनवाई,दोनों को कैट जाने का निर्देश।

नैनीताल-24 मार्च 2026

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के वरिष्ठ अधिकारियों नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी को उनकी इच्छा के विरुद्ध की दी गयी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को चुनौती देने के लिए केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) का रुख करने के निर्देश दिए हैं।

नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी ने छोटे रैंक पर प्रतिनियुक्ति का विरोध जताया है⤵️

नैनीताल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिए। उत्तराखंड कैडर के आईपीएस गर्ग और जोशी ने नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दायर कर केंद्रीय बलों में अपनी इच्छा के विरुद्ध और वह भी अपने वर्तमान रैंक से निचले पदों पर प्रतिनियुक्ति को चुनौती दी थी।

अरुण मोहन जोशी बीएसएफ,नीरू गर्ग आईटीबीपी की डीआईजी बनाई गई हैं⤵️

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा एक आदेश के माध्यम से 2005 बैच की आईपीएस अधिकारी नीरू गर्ग को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में उप महानिरीक्षक (डीआईजी) के रूप में तैनात किया गया। 2006 बैच के आईपीएस अरुण मोहन जोशी को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में डीआईजी के रूप में नियुक्त किया गया है।

दोनों अधिकारी अभी आईजी हैं⤵️

दोनों अधिकारी फिलहाल उत्तराखंड पुलिस में पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) के पद पर कार्यरत हैं और उन्होंने याचिका में कहा था कि उन्होंने कभी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए न तो आवेदन किया और न ही उसके लिए सहमति दी। दोनों अधिकारियों ने दलील दी कि इसके बावजूद उन्हें जबरन डीआईजी के निचले रैंक पर भेजा जा रहा है।

याचिका में कहा गया कि अधिकारियों ने पहले केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए अनिच्छा व्यक्त की थी और उन्हें पांच साल के लिए इससे वंचित भी कर दिया गया था। लेकिन इसके बावजूद,राज्य सरकार ने 16 फरवरी, 2026 को उनके नाम केंद्र को भेजे, जिसके बाद उसके द्वारा उनकी प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी कर दिए गए।

उत्तराखंड सरकार ने दी ये दलील⤵️

राज्य ने दलील दी कि प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 14 के अनुसार याचिका उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय नहीं है। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली। उन्हें कैट में आदेश को चुनौती देने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है।

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