जोशीमठ भू धंसाव:-मानसून सीजन शुरू होने से पहले ही एक बार फिर जोशीमठ की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होने लगे।

जोशीमठ भू धंसाव:-मानसून सीजन शुरू होने से पहले ही एक बार फिर जोशीमठ की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होने लगे।

जोतिर्मठ (चमोली)-27 अप्रैल 2026

उत्तराखंड राज्य में मानसून सीजन शुरू होने से पहले ही एक बार फिर जोशीमठ की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। दरअसल,जोशीमठ में मौजूद घरों में दरारें पड़ रही हैं। क्योंकि जोशीमठ शहर के फिसलने की प्रक्रिया अभी भी जारी है। हालांकि, वर्तमान समय में स्लोप के खिसकने की स्पीड बेहद कम है लेकिन वैज्ञानिकों ने ये आशंका जताई है कि शायद मानसून सीजन के दौरान जोशीमठ एक बार फिर से अपनी जमीन छोड़ने लग सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि  जोशीमठ में हो रहे भू धसाव को लेकर भले ही राज्य सरकार ने कदम आगे बढ़ाए हो और वहां पर तमाम संवेदनशील मकानों का चिन्हीकरण किया हो, लेकिन उससे आगे कोई भी काम नहीं हो पाया जो भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है। आखिर क्या क्या है चुनौती, किन बिंदुओं पर फोकस करने की है ज़रुरी, आपदा प्रबंधन विभाग क्या कर रहा है काम? आइए आपको बताते है….

साल 2023 के जनवरी माह में उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में भू-धसाव का मामला काफी ज्यादा चर्चाओं में आया था। उस दौरान जोशीमठ क्षेत्र में हुए भू-धंसाव की वजह से करीब 800 से ज्यादा मकानों में काफी अधिक दरारें पड़ी हुई थी। इसके बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने विशेषज्ञों की टीम गठित की थी। जिस टीम में एनडीएमए, जीएसआई, सीबीआरआई समेत अन्य संस्थानों के 35 सदस्य शामिल थे। ऐसे में वैज्ञानिकों की अध्ययन रिपोर्ट को सार्वजनिक किए जाने की मांग भी उठी। जिसके चलते, नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश पर आठ संस्थाओं की ओर से रिपोर्ट सार्वजनिक की गई जिसमे भू-धंसाव के वजहों को बताया गया।

जिसमें मुख्य रूप से जल निकासी की कमी और मानवीय गतिविधियों का जिक्र किया गया।हालांकि, एनडीएमए ने रिपोर्ट भी जारी की थी। जिस रिपोर्ट में जिक्र किया गया था कि, करीब 2152 मकानों में से 1403 मकान प्रभावित हुए है। जिसमें से 472 मकानों के पुनर्निर्माण और 931 मकानों के मरम्मत की जरूरत महसूस हुई। यही नहीं, 181 भवनों को खाली कराया गया जो काफी ज्यादा संवेदनशील हो गए थे। लेकिन समय के साथ लोग फिर से अपने पुराने घरों में रहने लगे। जिसके चलते आगामी मानसून के दौरान एक बार फिर इन सभी लोगों पर खतरा बढ़ सकता है। बावजूद इसके चिन्हित संवेदनशील मकान में रह रहे लोग अन्य स्थानों पर विस्थापित होने को तैयार नहीं है। जबकि जिस जगह वह विस्थापित होना चाहते हैं उस भूमि के ट्रांसफर में पेंच फंसा हुआ है।

जोशीमठ में हो रहे भू-धंसाव की गंभीरता को देखते हुए साल 2023 में भारत सरकार ने जोशीमठ शहर के रिकवरी और रिकंस्ट्रक्शन के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन भी किया था। इसके साथ ही 30 नवम्बर 2023 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में दिल्ली में उच्च स्तरीय समिति की बैठक की गई थी। जिस बैठक में जोशीमठ के लिए 1658.17 करोड़ रुपये की रिकवरी और रिकंस्ट्रक्शन योजना को मंजूरी मिली थी। इसके साथ ही उस दौरान निर्णय लिया गया था कि जोशीमठ के लिए रिकवरी योजना को बैस्ट प्रैक्टिसिस, बिल्ड बैक बैटर Build Back Better सिद्धांतों और स्थिरता पहल Sustainability Initiatives का पालन करते हुए तीन सालों में लागू किया जाएगा। हालांकि, इस दिशा में काम तो चल रहा है लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो पाई है। जोशीमठ में हो रहे भू-धंसाव के वजहों को जानने को लेकर तमाम अध्ययन किए जा चुके हैं जबकि वर्तमान समय में भी कुछ अध्ययन जारी है। पहले हुए अध्ययनों में पाया गया था कि भू-धंसाव अलग-अलग जगह पर कुछ सेंटीमीटर से लेकर 14.5 मीटर तक है। इसके साथ ही इस बात पर भी जोर दिया गया कि जोशीमठ शहर पुराने भूस्खलन के मलबे के ऊपर बसा है जिस वजह से जमीन लगातार धंस रही है। हालांकि, वर्तमान समय में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक डॉ मनीष मेहता भी जोशीमठ पर अध्ययन कर रहे है। अध्ययन के शुरुआती चरण में ये पता चला है कि जोशीमठ क्षेत्र भूस्खलन के मलबे पर नहीं बल्कि ग्लेशियर के छोड़े हुए मालवे के ढेर पर बसा है। यानी ग्लेशियर के पीछे खिसकने के बाद जो मालवा आगे छूट गया वो करीब 7 हज़ार साल पुराना है। जिस पर जोशीमठ शहर बसा हुआ है।

जोशीमठ शहर की वर्तमान स्थिति के सवाल पर, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ विनीत गहलोत ने कहा कि जोशीमठ में भू-धसाव का मामला सामने आने के बाद वहां पर जो अध्ययन का काम हुआ उसकी रिपोर्ट यूएसडीएमए की वेबसाइट पर मौजूद है। जोशीमठ में जो स्लोप खिसकने की प्रक्रिया चल रही है उसको रोक तो नहीं सकते है, लेकिन वहां की लगातार मॉनिटरिंग होते रहनी चाहिए थी। क्योंकि आगामी मानसून सीजन के दौरान, या फिर अगले कुछ समय में ही तेजी से  स्लोप खिसकने लग जाए तब हम लोग क्या करेंगें? क्या हम लोग फिर से घरों में दरार पड़ने का इंतजार करेंगे या फिर जैसे ही स्लोप खिसकने लगे और उसके लिए हमारे पास मॉनिटरिंग सिस्टम हो ताकि लोगों को तत्काल सचेत कर दे कि अब समय आ गया है, कि यहां से विस्थापित हो जाए। लिहाजा इस दिशा में काम करने की जरूरत है। साथ ही वाडिया के डायरेक्टर ने कहा कि  जिन मकानों में दरारें पड़ गई हैं उनको सिर्फ चिन्हित करने और संवेदनशील घोषित करने से काम नहीं चलेगा। उन्हें अभी ये अंदाजा नहीं है कि उन घरों में लोग रह रहे हैं कि नहीं रह रहे हैं। लेकिन अभी लोगों में ये भ्रांतियां है कि जोशीमठ खिसक नहीं रहा है। जबकि अभी भी जोशीमठ खिसक रहा है, हालांकि, ये जरूर है कि खिसकने की गति बहुत धीमी है। लेकिन डर इस बात का है कि मानसून के दौरान स्लोप के खिसकने की दर, बढ़ तो नहीं जाती है। ऐसे में मानसून आने से जोशीमठ के खिसकने की गति फिर से बढ़ गई, और पता चला की कुछ हिस्सा खिसक गया? तो ऐसी स्थिति में हमारे पास क्या प्लान है, उसके बारे में बात करने, विचार करने और इंप्लीमेंट करने की जरूरत है। साथ ही कहा कि केयरिंग कैपेसिटी के बारे में बात तो सब करते हैं लेकिन उसके इंप्लीमेंटेशन में हमेशा कमी रहती है।

तो वही, इस पूरे मामले पर आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने कहा कि जोशीमठ में भू-धसाव से जो नुकसान हुआ था उसके ट्रीटमेंट का काम शुरू हो गया है। ऐसे में जोशीमठ के जिस क्षेत्र में जमीन धस रही थी, वहां पर टो प्रोटेक्शन (Toe Protection) करने वाला काम चल रहा है। जिसके लिए 100 करोड़ रुपए की धनराशि स्वीकृत की गई है। जिसमें में पहले किस्त के रूप में जारी धनराशि का इस्तेमाल किया जा चुका है, और दूसरे किस्त की धनराशि भी जारी कर दी गई है। जोशीमठ में स्लोप स्टेबलाइजेशन का काम लोक निर्माण विभाग की ओर से किया जा रहा है, जिसके लिए धनराशि भी पहले ही जारी की जा चुकी है। साथ ही बताया कि जोशीमठ क्षेत्र में सीवरेज, ड्रेनेज और पेयजल काम के लिए टेंडर फाइनल हो गया है, ऐसे में बहुत जल्द ही इस काम को भी शुरू कर दिया जाएगा। इसके साथ ही अन्य संबंधित विषयों पर भी काम किया जा रहा है। हालांकि, विस्थापन को लेकर अभी कुछ इश्यू चल रहा है, क्योंकि लोगों जिस जगह पर विस्थापन के लिए सहमति जताई थी, वहां पर मकान भी बनाए गए लेकिन बाद में लोग शिफ्ट होने के लिए सहमत नहीं हुए। इसके अलावा भी कुछ और जगह को भी देखा गया है लेकिन वो जमीन किसी अन्य विभाग की है, जिसको वो ट्रांसफर नहीं कर सकते है। ऐसे में लोगों से बातचीत की जा रही है।

हर साल मानसून सीजन शुरू होने से पहले ही जोशीमठ के संवेदनशील क्षेत्रों में रह रहे लोगों में डर का माहौल उत्पन्न हो जाता है। और वैज्ञानिक भी अटकलें लग रहे हैं कि मानसून सीजन के दौरान भू-धसाव की रफ्तार तेज हो सकती है। जिस पर आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने कहा कि फिलहाल इसकी संभावना बहुत कम है। क्योंकि पहले चरण में वही काम किया जा रहे हैं, ताकि बरसात के दौरान वहां पर कोई आपदा जैसी स्थिति ना बने और मानसून शुरू होने से पहले इन कामों को पूरा भी कर लिया जाएं। ऐसे में अब देखना होगा कि वैज्ञानिकों की चिंता और सरकार के प्रयास वर्षाकाल के दौरान जोशीमठ में रह रहे लोगों की समस्या का आखिर परमानेंट समाधान किस तरह से कर पाएंगे ?

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