जसपाल राणा के निधन के चार दिन बाद मां श्यामा देवी ने भी ली अंतिम सांस,नही सह सकी बेटे के जाने का गम।
दिल्ली-16 जून 2026
भारतीय निशानेबाजी जगत और उत्तराखंड के लिए एक और बेहद दुखद खबर सामने आ रही है। देश के दिग्गज निशानेबाज, पद्मश्री से सम्मानित कोच और ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ियों के मार्गदर्शक रहे जसपाल राणा के निधन के महज चार दिन बाद उनकी माता श्यामा देवी राणा का भी सोमवार को दिल्ली के एक आर्मी अस्पताल में निधन हो गया। वह 78 वर्ष की थीं।
परिजनों के अनुसार, 12 जून 2026 को 49 वर्ष की आयु में जसपाल राणा के आकस्मिक निधन के बाद श्यामा देवी गहरे सदमे में थीं। बेटे की मौत का दुख वह सहन नहीं कर सकीं और उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता चला गया। अंततः सोमवार को उन्होंने भी अंतिम सांस ली। कुछ ही दिनों के भीतर मां-बेटे के निधन से राणा परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।
बेटे की सफलता के पीछे थीं मां की प्रेरणा⤵️
श्यामा देवी राणा हमेशा अपने बेटे जसपाल राणा की सबसे बड़ी प्रेरणा मानी जाती थीं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करने वाले जसपाल की उपलब्धियों के पीछे परिवार का त्याग और मां का निरंतर प्रोत्साहन अहम माना जाता है। उनके निधन की खबर से खेल जगत, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में शोक की लहर दौड़ गई है।
उत्तरकाशी से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर⤵️
उत्तराखंड के टिहरी में जन्में और फिर उत्तरकाशी से निकलकर विश्व शूटिंग जगत में अपनी अलग पहचान बनाने वाले जसपाल राणा ने एशियाई खेलों और कॉमनवेल्थ खेलों में कई पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया था। बाद में उन्होंने कोच के रूप में नई पीढ़ी के निशानेबाजों को तैयार किया और भारतीय शूटिंग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी कोचिंग में मनु भाकर, सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव जैसे कई प्रतिभाशाली निशानेबाजों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की। मनु भाकर के ओलंपिक पदक अभियान में भी जसपाल राणा की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
पिता ने बचपन में ही दी थी शूटिंग की सीख⤵️
जसपाल राणा का संबंध एक मजबूत खेल और राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से था। उनके पिता नारायण सिंह राणा इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) में तैनात रहे और बाद में उत्तराखंड की पहली नित्यानंद स्वामी सरकार में खेल मंत्री बने। बताया जाता है कि जब जसपाल महज 10 वर्ष के थे, तभी उनके पिता ने उन्हें पिस्टल और राइफल शूटिंग की बारीकियां समझानी शुरू कर दी थीं। शुरुआती दौर में उन्होंने दोनों स्पर्धाओं में अभ्यास किया, लेकिन बाद में फेडरेशन के नियमों के चलते उन्होंने पिस्टल शूटिंग को अपना मुख्य इवेंट चुना और इसी क्षेत्र में इतिहास रच दिया।
राजनीति में भी आजमाया था हाथ⤵️
खेलों में शानदार उपलब्धियां हासिल करने के बाद जसपाल राणा ने राजनीति में भी कदम रखा। वर्ष 2009 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर टिहरी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद वह कांग्रेस से भी जुड़े और कुछ समय तक राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। लेकिन अंततः उन्होंने राजनीति से दूरी बनाकर पूरी तरह शूटिंग और कोचिंग को समर्पित कर दिया।
देश ने खोया महान निशानेबाज और कोच⤵️
जसपाल राणा केवल एक सफल खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि भारतीय शूटिंग के ऐसे मार्गदर्शक थे जिन्होंने अनेक युवा खिलाड़ियों के सपनों को नई उड़ान दी। उनके निधन के बाद अब उनकी माता श्यामा देवी का जाना पूरे परिवार के लिए दूसरी बड़ी त्रासदी बन गया है।राणा परिवार के इस अपूरणीय नुकसान पर खेल जगत, राजनीतिक हस्तियों और उत्तराखंड के लोगों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाएगा।
