जोन 6 में शामिल होने के बाद अब बिल्डिंग बायलॉज में होगा बदलाव, इंफ्रास्ट्रक्चर और पावर प्रोजेक्ट्स का बढ़ेगा खर्च।

जोन 6 में शामिल होने के बाद अब बिल्डिंग बायलॉज में होगा बदलाव, इंफ्रास्ट्रक्चर और पावर प्रोजेक्ट्स का बढ़ेगा खर्च।

देहरादून- 08 दिसम्बर 2025

भारत सरकार की बीआईएस ने नया सीस्मिक मैप जारी किया है साथ ही देश के सभी हिमालयी क्षेत्रों को जोन 6 में रखा है। यानी इन सभी क्षेत्रों को भूकंप के लिहाज से अति संवेदनशील करार दिया है। जबकि पुराने सीस्मिक मैप के अनुसार, उत्तराखंड को जोन 4 और जोन 5 में रखा गया था, लेकिन अब पूरे उत्तराखंड को जोन 6 में रख दिया गया है। नया सीस्मिक मैप जारी होने के बाद अब प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों से लेकर पर्वतीय क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की नीति एक समान होगी। जिस दिशा में सरकार ने इस दिशा में अपनी रणनीतियां तैयार करने शुरू कर दी हैं। जिसके तहत मुख्य रूप से आवास विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग की क्या है रोडमैप?

बीआईएस की ओर से जारी नया सीस्मिक मैप उत्तराखंड राज्य के लिए काफी महत्वपूर्ण है। क्योंकि इस नए सीस्मिक मैप में पूरे उत्तराखंड राज्य को जोन 6 में रखा गया है। जिसका मतलब यह है कि प्रदेश से किसी भी क्षेत्र में अगर भूकंप आता है तो हर जगह पर एक समान इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचेगा। जबकि पुराने सीस्मिक मैप में उत्तराखंड को जोन 4 और जोन 5 में बांटा गया था। जिसके आधार पर प्रदेश में बिल्डिंग बायलॉज तैयार किया गया था। हालांकि, इस बायोलॉजी के तहत जोन 4 में रखे गए क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में थोड़ी रियायत दी गई थी। तो वही, जॉन 5 में रखे गए क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में कोई भी रियायत नहीं थी। ऐसे में अब जब पूरे प्रदेश को जोन 6 में रखा गया है तो फिर पूरे प्रदेश के लिए बिल्डिंग बायलॉज एक समान बनानी होगी। ऐसे में उत्तराखंड राज्य के लिए यह एक बड़ी चुनौती भी साबित होगी। दरअसल, उत्तराखंड राज्य पहले से ही सीमित आर्थिक संसाधनों में सिमटा हुआ है। ऐसे में अगर भविष्य में आने वाले बड़े भूकंप की संभावना को देखते हुए भूकंपरोधी इंफ्रास्ट्रक्चर के कार्य किए जाते हैं तो उसमें काफी अधिक पैसा खर्च होगा। इन सभी इंफ्रास्ट्रक्चर में न सिर्फ सड़क, पुल शामिल है बल्कि स्कूल, सरकारी दफ्तर समेत अन्य बिल्डिंग को भी भूकंपरोधी बनाना होगा। जो कम से कम 8 से 9 मेग्नीट्यूड के भूकंप को आसानी से झेल सके। ऐसे में इतने बड़े भूकंप को झेलने की क्षमता रखने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने में अत्यधिक पैसा भी खर्च होगा जो उत्तराखंड के लिए एक बड़ी चुनौती भी होगी। फिलहाल, उत्तराखंड सरकार बिल्डिंग बायलॉज में बदलाव करने के साथ ही जनता को भूकंप से बचाव के प्रति जागरूक करने पर जोर दे रही है।

वही, आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन के कहा कि पुराने सीस्मिक मैप में पूरे देश को चार जोन (जोन II, III, IV, V) में बंटा गया था। साथ ही उत्तराखंड के कुछ हिस्से को जोन 4 और कुछ हिस्से को जोन 5 में रखा गया था। ऐसे में हाल ही में जारी नए सीस्मिक मैप में उत्तराखंड को जोन 6 में रखा गया है। जिसका मतलब है कि उत्तराखंड राज्य भूकंप और आपदा की दृष्टि से काफी अधिक संवेदनशील हो गया है। जिसके तहत तमाम कदम भी उठाए जाने हैं। जिसमें मुख्य रूप से बिल्डिंग बायलॉज में बदलाव किया जाना है जिसके लिए आवास विभाग और रुड़की स्थित सीबीआरआई (Central Building Research Institute) मिलकर काम करेंगे। इसके अलावा लोगों का प्रशिक्षण, भूकंप से बचाव के लिए क्या-क्या उपाय किए जाने हैं, स्ट्रक्चर डिजाइन किस तरह से किया जाना है समेत तमाम बिंदुओं पर काम करने की जरूरत होगी। ऐसे में जितना सुरक्षित स्ट्रक्चर बना पाएंगे और लोगों को जागरुक कर पाएंगे उतना खतरे को टाल सकेंगे।

तो वही, आवास विभाग के प्रमुख सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम ने कहा कि अभी तक भूकंप की संवेदनशीलता को देखते हुए उत्तराखंड को जोन 4 और जोन 5 में रखा गया था। जिसके तहत प्रदेश में बिल्डिंग बायलॉज (Building Bylaws) लागू हैं। कई बार ऐसा देखा गया है कि लोग मल्टी स्टोरेज बिल्डिंग को संवेदनशीलता के साथ को रिलेट करते हैं, जो कि गलत है। ऐसे में अगर आप संवेदनशील क्षेत्र में है तो आपको भूकंपरोधी तकनीकी से बिल्डिंग बनाने होंगे। वर्तमान समय में जो बिल्डिंग बायलॉज लागू है उसी के अनुसार ही भूकंप रोधी तकनीकी, तीन मंजिला बिल्डिंग के साथ ही सौ मंजिला बिल्डिंग के लिए भी उपलब्ध है। जिसके तहत मैदानी क्षेत्रों में 7 से 8 मंजिला बिल्डिंग और पर्वतीय क्षेत्रों में तीन से चार मंजिला बिल्डिंग बनाने की अनुमति है.साथ ही बताया कि जो छोटे बिल्डिंग होते हैं वो ज्यादा संवेदनशील होते हैं क्योंकि वो सामान्य मिस्त्री से बनाए जाते हैं। बल्कि जो बड़े बिल्डिंग होते हैं उसको स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग डिजाइन करता है, जिसमें सेफ्टी के इशू ज्यादा नहीं आते हैं। मुख्य रूप से देखे तो जापान में अक्सर ही बड़े भूकंप आते रहते हैं लेकिन वहां मौजूद बड़े-बड़े बिल्डिंग को कोई भी नुकसान नहीं पहुंचता है, क्योंकि वहा की स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग डिजाइन काफी अधिक बेहतर है, जिसके चलते कोई कैजुअल्टी नहीं होती है। बताया कि नए सीस्मिक मैप की वजह से हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स में समस्याएं आने की संभावना है। हालांकि, इससे प्रोजेक्ट बन नहीं होंगे बल्कि प्रोजेक्ट बनाने में आने वाला खर्च बढ़ने की संभावना है। प्रमुख सचिव ने एग्जांपल देते हुए कहा कि टिहरी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट जो तैयार किया गया है वो 8.5 मेग्नीट्यूड भूकंप को झेलने की क्षमता रखता है। ऐसे में अगर 8.5 मेग्नीट्यूड से अधिक का भूकंप आता है तो कुछ नहीं कहा जा सकता। वर्तमान समय में उत्तराखंड को जोन 6 में रखा गया है, ऐसे में 8.5 मेग्नीट्यूड से बड़ा भूकंप आने की संभावना बढ़ जाती हैं। ऐसे में अगर तेरी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को 9 मेग्नीट्यूड भूकंप को खेलने के तहत विकसित करते हैं तो उसका खर्च ऊपर आएगा। ऐसे में किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर को अगर भूकंपरोधी बनाते हैं तो उसमें आने वाला खर्च बढ़ जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!