लाटू धाम वाण से मां नंदा की देव ड़ोलियां कैलास को रवाना,शुक्रवार को बेदनी कुंड में स्नान,पूजा अर्चना और पित्रृ तर्पण का आयोजन।

लाटू धाम वाण से मां नंदा की देव ड़ोलियां कैलास को रवाना,शुक्रवार को बेदनी कुंड में स्नान,पूजा अर्चना और पित्रृ तर्पण का आयोजन।

देवाल (चमोली):-17 सितंबर 2026
रिपोर्ट-रजपाल बिष्ट.

लाटूधाम वाण से मां नंदा की देव ड़ोलियां कैलास के लिए रवाना हो गई हैं। इसके तहत शुक्रवार को बेदनी कुंड में देवी देवताओं का स्नान तो होगा ही अपितु पित्रों के निमित श्राद्ध और तर्पण की परम्परा का निर्वहन होगा।

वाण में देवी देवताओं की पूजा अर्चना के पश्चात नंदा के धर्म भाई लाटू देवता की अगुवाई में मां नंदा की ड़ोलियां और छंतोलियां कैलास को रवाना हुई। इस दौरान तमाम लोग नंदा की कैलास विदाई पर भाव विह्वल हो उठे। कई लोगों की आंखें छलछला उठी। मां नंदा की विदाई नंदा के जयकारों के साथ हुई। नंदा बड़ी जात की दशोली तथा बंड की उत्सव ड़ोलियां और छंतोलियां तथा बधाण की राजराजेश्वरी की लोकजात की उत्सव डोली भी कैलास को विदा हुई। हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में देव ड़ोलियां रात्रि प्रवास को निर्जन पड़ाव गैरोलीपातल पहुंची। देव ड़ोलियों और छंतोलियों संग श्रद्धालुओं का हुजूम भी वाण से कैलास की यात्रा पर निकल पड़ा है।

शुक्रवार को बेदनी कुंड में स्नान, पूजा अर्चना और पित्रृ तर्पण का आयोजन।

शुक्रवार को देव ड़ोलियों वेदनी कुंड जाएंगी। इस दौरान बेदनी कुंड में मां नंदा का स्नान होगा। उसके पश्चात नंदा की पूजा अर्चना के बाद पित्रों के निमित श्राद्ध और तर्पण की परंपरा का निर्वहन होगा। बेदनी में आस्था, लोक विश्वास और प्रकृति का अद्भुत समागम भी देखने को मिलेगा। इस धार्मिक परंपरा का निर्वहन करने के लिए हजारों श्रद्धालु साक्षी बनेंगे। मान्यता है कि कैलास जाते समय मां नंदा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध कर उसे इसी कुंड में समा दिया था। यही वजह है कि बेदनी कुंड धार्मिक आस्थावानों के लिए एक जल कुंड ही नहीं अपितु मां नंदा की सदियों से चली आ रही यात्रा और शक्ति का जीवंत प्रतीक भी है।

कहा जाता है कि बेदनी पहुंचकर मां नंदा की यात्रा एक तरह से प्रकृति और परमात्मा के और करीब पहुंच जाती है। यहा होने वाली पूजा अर्चना के दौरान हिमालयवासियों के आराध्य भगवान शंकर स्वंय मौजूद रहते हैं। यही वजह है कि इस पल का साक्षी बनने के लिए धर्मावलंबी दुर्गम और कठिन रास्तों को पार कर बेदनी कुंड पहुंचते हैं। बेदनी कुंड में तो मां नंदा की पूजा के साथ पित्रों के निमित श्राद्ध और तर्पण की परंपरा भी है। पुजारी देवी दत्त कुनियाल के अनुसार बेदनी कुंड में पित्रृ तर्पण से लोग अपने पुरखों को भी याद करते हैं। इस तरह बेदनी कुंड में स्नान,पूजा तथा तर्पण की धार्मिक क्रियाओं का निर्वहन होने के पश्चात बधाण की नंदा की लोकजात यात्रा वापस शुक्रवार को बांक गांव लौट आएगी। इसके पश्चात नंदा की देव ड़ोली 6 माह के लिए प्रवास पर सिद्धपीठ देवराड़ा के गर्भगृह में विराजमान हो जाएगी।

नंदा की बड़ी जात के तहत दशोली तथा बंड की उत्सव ड़ोलियां उच्च हिमालय में स्थित होमकुंड को रवाना होंगी। बेदनी कुंड से होमकुंड तक की यह यात्रा बेहद कठिन और चुनौती पूर्ण भी बनी रहेगी। होमकुंड पहुंचने पर चैसिंग्ये खाडुओं को कैलास के लिए विदा किया जाएगा। इसके बाद देव ड़ोलियां सुतोल गांव के लिए वापसी करेंगी और सिद्धपीठ कुरूड़ पहुंचकर गर्भगृह में विराजमान हो जाएंगी।

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