पारंपरिक खेती साबित हो रही घाटे का सौदा,मौसम की मार ओर जंगली जानवर कर रहे दोहरा नुकसान।
मेहलचौरी (गैरसैंण)-09 सितंबर 2026
रिपोर्ट-प्रेम संगेला
परेशानियां खेती किसानी करने वालों का पीछा नहीं छोड़ रही हैं,कभी जंगली जानवरों का उत्पात तो कभी मौसम की मार किसानों को रुलाती रहती है। जिससे पारंपरिक खेती करने वाले ग्रामीण किसानों को दोहरी मार झेलनी पड रही है।
4 महीने की बरसात के आखिरी दौर में सप्ताह भर की भारी बारिश के बाद अब कुछ राहत मिली तो,धूप खिलने की खुशी किसानों के चेहरे पर भी दिखाई दे रही थी। जिससे उत्साहित गैरसैंण क्षेत्र के किसानों के खेत खलिहानों में पहुंचने की रौनक भी दिखाई दे रही है। इस बार अच्छी बरसात के बाद खेतों में खूब अच्छी फसल तो लहलहाई, लेकिन फसल पकने के दौरान हुई लगातार बारिश ने किसानों की सारी मेहनत पर पानी फेर दिया है।
कुछ दिनों पूर्व धान की फसल काटने के बाद खेतों में इकठ्ठा की गई फसल लगभग पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। मंडाई के लिए खेतों में रखा धान काला पड़ने से बर्बाद हो गया है,लंबे दिनों की नमी के चलते धान बिना मंडाई के ही अंकुरित होने लगा है। जिससे 6 महीने से फसल की देखभाल करने वाले किसान के हाथ निराशा ही लगी है।
गैरसैंण नगर के सलियाणा गांव निवासी कुंवर सिंह रावत गुड्डू और दिगंबर सिंह का परिवार जब सुबह नजदीकी खेतों में धान मंडाई के लिए गए तो सारी फसल खराब देख निराश हो गये,उन्होंने कहा की धान अंकुरित होने के साथ ही काला पड चुका है,जिससे अगली फसल के बीज के लायक भी धान इकठ्ठा नहीं हो पाया है।
वहीं बरसाती सीजन की दूसरी फसलों में शामिल मंडवा,चौलाई ,कोणी,झंगोरे व दाल की फसलों को सूअर बंदर ओर चिडियाएं लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं,जिससे किसानों को मौसम ओर जानवरों की दोहरा नुकसान झेलना पड रहा है। जिससे पारंपरिक खेती करना अब घाटे का सौदा ही साबित हो रहा है।
मेहलचौरी में पॉली हाउस लगाकर बडी मात्रा में सब्जी उत्पादन करने वाले शाह फार्मिंग के संचालक सिलंगा निवासी हरेंद्र शाह ओर खनसर के कंडारीखोड में सेब सहित विभिन्न उधान उत्पाद का कलक्टर चला रहे कौशल रावत कहते हैं कि,पारंपररिक खेती में अत्यधिक जोखिम रहता है कभी ज्यादा तो कभी कम बारिश के मौसमी बदलाव ओर जानवरों से नुकसान की भी ज्यादा आशंका रहती है। इसके विपरीत नगदी फसलों,सब्जी,फूल ओर फलों के उत्पादन में कम मेहनत के साथ ही मौसम ओर जानवरों का जोखिम भी कम है। लेकिन आमतौर पर लोग पारंपरिक खेती को बदलने को तैयार नहीं होते हैं। एक बार अच्छी कमाई शुरू होने पर ही किसान की धारणा बदलती है। जिसके लिए शुरूआत में छोटे स्तर पर प्रयोग कर किसान को अच्छी कमाई के लिए प्रेरित किया जाना चाहिये।
