सुनवाई टली-हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि विवाद पर फिर बढ़ा इंतजार,सुप्रीम कोर्ट में अब 17 सितंबर को होगी सुनवाई।
हल्द्वानी (नैनीताल):-09 सितंबर 2026
उत्तराखंड के नैनीताल जिले के हल्द्वानी बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण विवाद में प्रभावित परिवारों को एक बार फिर इंतजार करना पड़ेगा। आज बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई प्रस्तावित थी, लेकिन अदालत में आपात मामलों की सुनवाई के कारण यह मामला आगे नहीं बढ़ सका है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बनभूलपुरा का मामला इमरजेंसी हियरिंग की श्रेणी में नहीं आता। अब मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को होने की संभावना है। मामले की सुनवाई टलने के साथ ही उन हजारों परिवारों की चिंता और बढ़ गई है,जिनका भविष्य इस विवाद से जुड़ा हुआ है। लंबे समय से चल रहे इस कानूनी विवाद में रेलवे और प्रभावित परिवार अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार विवादित क्षेत्र में करीब 30.040 हेक्टेयर भूमि शामिल है। यहां लगभग 4,365 मकानों में 50 हजार से अधिक लोग रहने की बात सामने आई है। रेलवे का दावा है कि उसकी प्रस्तावित रेल परियोजनाओं और ट्रैक के रियलाइन्मेंट के लिए करीब 30.65 हेक्टेयर जमीन की आवश्यकता है। विवाद केवल आवासीय मकानों तक सीमित नहीं है। संबंधित क्षेत्र में सरकारी और निजी स्कूलों के अलावा धार्मिक स्थल और स्वास्थ्य केंद्र भी मौजूद हैं। यही वजह है कि मामले को केवल अतिक्रमण हटाने के बजाय मानवीय और पुनर्वास के पहलू से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की संभावना को देखते हुए हल्द्वानी प्रशासन और नैनीताल पुलिस पहले से सतर्क थी। बनभूलपुरा क्षेत्र को अलग-अलग जोन और सेक्टर में बांटकर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई थी। इलाके में पुलिस और सशस्त्र बलों की तैनाती के साथ दंगा-रोधी दल भी तैयार रखे गए।ड्रोन के जरिए संवेदनशील क्षेत्रों पर निगरानी की गई, जबकि सोशल मीडिया गतिविधियों पर भी नजर रखी गई। पुलिस ने लोगों से छतों पर पत्थर, ईंट या मलबा जमा नहीं करने की अपील करते हुए ऐसा पाए जाने पर कार्रवाई की चेतावनी दी थी।
बनभूलपुरा की रेलवे भूमि को लेकर विवाद नया नहीं है। वर्ष 2007 से अलग-अलग स्तर की अदालतों में इस मामले को लेकर कानूनी प्रक्रिया चल रही है। रेलवे और राज्य सरकार की ओर से समय-समय पर जमीन खाली कराने की कार्रवाई की कोशिश की गई, लेकिन प्रभावित पक्षों की कानूनी आपत्तियों के चलते मामला लगातार अदालतों में बना रहा।दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रेलवे को अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रभावित लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए यह महत्वपूर्ण बात कही थी कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों को अचानक उनके घरों से नहीं हटाया जा सकता।
रेलवे का कहना है कि विवादित जमीन उसके आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज है। अपने पक्ष में रेलवे ने पुराने नक्शों, 1959 की अधिसूचना, 1971 के राजस्व दस्तावेज और 2017 में किए गए सर्वे का हवाला दिया है। रेलवे के मुताबिक यह जमीन भविष्य की रेल परियोजनाओं और रेलवे लाइन के रियलाइन्मेंट के लिए जरूरी है। इसलिए भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना उसके लिए अहम है। दूसरी ओर, प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे कई दशकों से इस इलाके में रह रहे हैं। उनका तर्क है कि सरकारी रिकॉर्ड के अलावा नगर निगम के हाउस टैक्स दस्तावेजों में भी उनके नाम दर्ज हैं। कई परिवारों के पास बिजली और पानी के कनेक्शन होने की बात भी सामने आई है। कुछ परिवारों ने अपने मकान और जमीन पर अधिकार से संबंधित दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश किए हैं। यही दावे इस मामले को कानूनी रूप से और जटिल बनाते हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केवल जमीन खाली कराने के सवाल पर ही ध्यान नहीं दिया,बल्कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को भी महत्वपूर्ण माना है। 24 फरवरी 2026 को अदालत ने पात्र परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना यानी PMAY के तहत आवेदन करने के निर्देश दिए थे। इसके लिए उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को विशेष कैंप आयोजित कर प्रभावित लोगों से आवेदन लेने की जिम्मेदारी दी गई थी। आवेदन प्रक्रिया को 31 मार्च 2026 तक पूरा करने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट के समक्ष रेलवे और राज्य सरकार की ओर से यह व्यवस्था भी रखी गई है कि यदि संबंधित ढांचे हटाए जाते हैं तो प्रत्येक परिवार के मुखिया को छह महीने तक हर महीने 2,000 रुपये की अनुग्रह राशि दी जा सकती है। इसके अलावा 13 परिवारों की ओर से छोटे भूखंडों पर मालिकाना हक से जुड़े दावे भी अदालत के सामने आए हैं। ऐसे दावों पर भी आगे की न्यायिक प्रक्रिया में विचार होना है।आज बुधवार की सुनवाई टलने के बाद अब सभी पक्षों की नजरें 17 सितंबर की अगली सुनवाई पर हैं। उस दिन अदालत मामले में आगे की दिशा तय कर सकती है। फिलहाल बनभूलपुरा के हजारों प्रभावित परिवारों के लिए स्थिति जस की तस बनी हुई है। एक तरफ रेलवे अपनी जमीन और प्रस्तावित परियोजनाओं को लेकर अपना पक्ष रख रहा है,वहीं दूसरी ओर प्रभावित परिवार लंबे समय से अपने घर और पुनर्वास के अधिकार को लेकर न्यायालय से राहत की उम्मीद कर रहे हैं।
