उत्तराखंड के आईपीएस अधिकारी नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी के प्रतिनियुक्ति मामले पर केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण से बड़ी राहत,डेपुटेशन आदेश पर लगाई रोक।

उत्तराखंड के आईपीएस अधिकारी नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी के प्रतिनियुक्ति मामले पर केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण से बड़ी राहत,डेपुटेशन आदेश पर लगाई रोक।

उत्तराखंड-08 अप्रैल 2026

उत्तराखंड के दो आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (Central Administrative Tribunal) ने बड़ी राहत दी है। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के आदेश के खिलाफ इन अधिकारियों ने कैट (CAT) का दरवाजा खटखटाया था, जिसके बाद कैट ने फिलहाल इन अफसरों की प्रतिनियुक्ति को लेकर दिए गए आदेश पर रोक लगाई है।

बता दें कि उत्तराखंड में भारतीय पुलिस सेवा के दो अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति का मामला पिछले काफी दिनों से चर्चाओं में रहा। इस दौरान ये कहा गया कि इन अधिकारियों को बिना उनकी सहमति लिए प्रतिनियुक्ति पर भेजने का आदेश जारी किया गया। ये अधिकारी हैं, आईपीएस नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी। ये दोनों ही अधिकारी उत्तराखंड में आईजी रैंक पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। खास बात ये है कि केंद्र की तरफ से इन्हें प्रतिनियुक्ति को लेकर जिम्मेदारी दिए जाने के अगले ही दिन राज्य ने इन्हें रिलीव भी कर दिया। हालांकि, इसके खिलाफ इन दोनों ही अधिकारियों ने नैनीताल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जहां केंद्र की तरफ से भी प्रतिनियुक्ति के आदेश को लेकर पक्ष रखा गया। याचिकाकर्ता के वकील ने भी इसे नियम विरुद्ध बताया। हालांकि, तब इन दोनों ही अधिकारियों को कोई राहत नहीं मिल पाई थी और हाईकोर्ट ने इन्हें सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल यानी केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में जाने की सलाह दी थी। इसके बाद इस मामले को लेकर ये अफसर कैट (CAT) पहुंचे। जहां से इन अधिकारियों को फिलहाल राहत मिल गई है। याचिकाकर्ता के वकील का पक्ष सुनने के बाद CAT ने अग्रिम आदेशों तक प्रतिनियुक्ति से जुड़े राज्य के आदेश पर रोक लगा दी है।

➡️क्या है पूरा मामला⤵️

दरअसल, साल 2005 की आईपीएस अधिकारी (IPS) नीरू गर्ग को केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन भारत तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) में उप महानिरीक्षक (डीआईजी) के रूप में तैनात किया गया। आईजी स्तर के अधिकारी अरुण मोहन जोशी को केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन सीमा सुरक्षा बल (BSF) में डीआईजी (DIG) नियुक्त किया गया है।इसको लेकर गृह मंत्रालय की ओर से 5 मार्च 2026 को आदेश जारी किए गए थे. यह आदेश मिलते ही उत्तराखंड सरकार ने बीती 6 मार्च 2026 को दोनों अधिकारियों को कार्यमुक्त कर प्रतिनियुक्ति पर जाने के आदेश पारित कर दिया, लेकिन इन अधिकारियों ने प्रतिनियुक्ति के आदेश को नैनीताल हाईकोर्ट में चुनौती दे दी।फिलहाल, ये दोनों अधिकारी उत्तराखंड पुलिस में पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि उन्होंने कभी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए न तो आवेदन किया,न ही उसके लिए सहमति दी। दोनों ही अधिकारियों ने ये दलील दी कि इसके बावजूद उन्हें जबरन डीआईजी के निचले रैंक पर भेजा जा रहा है।

राज्य सरकार ने 16 फरवरी 2026 को उनके नाम केंद्र को भेजे। जिसके बाद उनकी प्रतिनियुक्ति के आदेश भी जारी कर दिए गए। अपनी याचिका में उन्होंने कहा कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध प्रतिनियुक्ति पर भेजा जा रहा है, जो पूरी तरह से असंवैधानिक है।साथ ही उन्होंने ये भी दलील दी कि आईजी स्तर के अधिकारी होने के बावजूद डीआईजी पद पर भेजना, उनके लिए प्रोफेशनल डिमोशन के जैसा है, यानी अपने पद से नीचे के पद पर तैनाती देने जैसा है। अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने कभी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आवेदन नहीं किया और न ही इसके लिए सहमति दी। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि वे पहले ही केंद्रीय बलों में जाने से अपनी अनिच्छा जता चुके थे और उन्हें निर्धारित 5 साल की अवधि के लिए छूट भी प्रदान की गई थी। इस दलील के बावजूद भी इन अधिकारियों को नैनीताल हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली और उन्हें केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) का रुख करने की सलाह दी गई। इसके बाद उन्होंने CAT में अपील की, जहां से अब उन्हें आंशिक राहत मिल गई है। कैट ने फिलहाल, केंद्र सरकार के आदेश पर रोक लगा दी है और राज्य सरकार को चार हफ्ते के भीतर पूरे मामले से जुड़े नियमों और अपनाई गई प्रक्रिया के दस्तावेजों समेत अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

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