उत्तराखंड एससी-एसटी स्कॉलरशिप घोटाला मामला,ईडी ने 13.83 करोड़ रुपये की संपत्ति की अटैच।
देहरादून-16 जून 2026
उत्तराखंड में ईडी ने बड़ी कार्रवाई की है,ED ने एससी-एसटी छात्रवृत्ति घोटाले की जांच के सिलसिले में PMLA, 2002 के तहत लगभग 13.83 करोड़ रुपये की चल और अचल प्रॉपर्टी को प्रोविजनल रूप से अटैच किया है। यह कार्रवाई ईडी के देहरादून सब जोनल ऑफिस ने की है,यह पैसा उत्तराखंड सरकार के समाज कल्याण विभाग से जारी किया गया था।
गौरतलब है कि उत्तराखंड में SC/ST स्कॉलरशिप स्कैम की जांच 2020 से चल रही है। अब तक, ED ने स्पेशल कोर्ट PMLA (Prevention of Money Laundering Act), देहरादून के सामने 05 अभियोजन शिकायत (Prosecution Complaint) फाइल की हैं. मामले में 05 प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर (PAO) जारी किए हैं। बताते चलें कि उत्तराखंड पुलिस ने साल 2011-12 से साल 2016-17 के दौरान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति यानी एससी और एसटी के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप में धोखाधड़ी और पैसा गबन करने को लेकर मुकदमा लिखाया था, इसके बाद मामला ईडी के पास पहुंचा।
ईडी की ओर से प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी पीएमएलए के तहत इनक्वायरी की गई, तब पता चला कि कई निजी शिक्षण संस्थानों ने एससी-एसटी छात्रवृत्ति में बड़ी गड़बड़ी की है। इन संस्थानों के लोगों ने समाज कल्याण विभाग की ओर से दी जाने वाली छात्रवृत्ति को फर्जीवाड़ा करके हासिल कर लिया। चौंकाने वाली बात ये रही कि फर्जी और अयोग्य छात्रों को छात्रवृत्ति का लाभार्थी दर्शाया गया। ED की PMLA के तहत हुई जांच से पता चला कि कुछ प्राइवेट इंस्टीट्यूट जैसे मदरहुड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी (रुड़की), रुड़की इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज/मेडिकल साइंसेज (RIMS- हरिद्वार) और महावीर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (मेरठ, यूपी) ने अपने मैनेजमेंट और उनसे जुड़ी ट्रस्टों के साथ मिलकर धोखाधड़ी से स्कॉलरशिप का पैसा हासिल किया। इन सभी ने अयोग्य छात्रों को लाभार्थी के तौर पर दिखाया। इन छात्रों की या तो असली नहीं थे या इनकी पहचान वेरिफाई नहीं हो सकती थी। जांच में पता चला कि इन इंस्टीट्यूशन से जुड़े 6,208 स्कॉलरशिप क्लेम को जिला समाज कल्याण अधिकारी (DSWO) हरिद्वार ने प्रोसेस किया था। जांच अवधि के दौरान लगभग 27.98 करोड़ रुपये की स्कॉलरशिप राशि बांटी गई। बांटी गई कुल राशि में से लगभग 19.74 करोड़ रुपये सीधे इंस्टीट्यूट के बैंक खाते में जमा किए गए। वहीं,लगभग 8.24 करोड़ रुपये छात्रों के नाम पर खोले गए बैंक खातों में जमा किए गए। यह भी सामने आया कि जो बैंक अकाउंट छात्रों के नाम पर चलाए जा रहे थे वो कॉलेज मैनेजमेंट और स्टाफ के कंट्रोल में थे। कई छात्रों के खातों में कॉलेज कर्मचारियों के फोन नंबरों का इस्तेमाल किया गया था। ऐसे कामों के लिए बिचौलियों को लगाया गया था।
जांच में मनिका शर्मा का नाम भी सामने आया,जो स्कॉलरशिप फंड को दूसरी जगह लगाने के काम करती थी। शर्मा संबंधित संस्थानों और सोसायटियों के कामकाज को संभालती थीं। स्कॉलरशिप फंड को शिक्षण सोसायटियों,ट्रस्टों और संबंधित संस्थाओं के अलग-अलग बैंक खातों में घुमाया जाता था,ताकि पैसों के स्रोत को छिपाया जा सके।
ईडी की जांच में छात्रवृत्ति के कुल 6,208 दावों में से 2,895 दावे फर्जी निकले थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि अनुपस्थित रहे 668 छात्रों को ही 3,85,70,640 रुपये (3 करोड़ 85 लाख 70 हजार 640 रुपए) की राशि बांट दी गई। इसी तरह असफल और रिजल्ट नहीं आने वाले और एग्जाम फॉर्म नहीं भरने वाले 84 स्टूडेंट को भी 33,65,120 रुपये (33 लाख 65 हजार 120) की राशि वितरित करना दर्शाया गया. विश्वविद्यालय में रजिस्टर्ड नहीं होने वाले 1,662 स्टूडेंट को 7,34,31,400 रुपये (7 करोड़ 34 लाख 31 हजार 400) रुपए की छात्रवृत्ति बांटने की रिकॉर्ड दिखाया गया। यही नहीं विवि से नॉन एफिलेटेड कोर्स के 47 विद्यार्थियों को 29,75,100 रुपये (29 लाख 75 हजार 100रुपए) छात्रवृत्ति के रूप में वितरित करना दर्शाया गया। कॉलेज डेटा में छात्र नहीं मिलने या डुप्लिकेट छात्रों के 434 मामले में 2,00,10,800 रुपये (2 करोड़ 10 हजार 800 रुपए) जारी करना दिखाया गया। ईडी के अनुसार इस समेकित (consolidated) आंकड़े में हर छात्र को सिर्फ एक बार गिना गया है, भले ही उन्हें लगातार सालों में या ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों तरह से स्कॉलरशिप मिली हो। ईडी के अनुसार जांच में आगे पता चला कि कॉलेज मैनेजमेंट और स्टाफ के कंट्रोल में स्टूडेंट्स के नाम पर बैंक अकाउंट खोले गए और चलाए गए। कई स्टूडेंट अकाउंट खोलने के लिए कॉलेज के कर्मचारियों के कॉमन मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किया गया। एडमिशन और बैंकिंग फॉर्मैलिटीज को आसान बनाने के लिए बिचौलियों को रखा गया। ऐसे अकाउंट में जमा की गई स्कॉलरशिप की रकम बाद में इंस्टीट्यूशन्स को वापस ट्रांसफर कर दी गई या कैश में निकाल ली गई।
ईडी के अनुसार, ऐसे खातों में SC/ST छात्रों के लिए समाज कल्याण विभाग से जारी पैसों को फिर संस्थानों को वापस ट्रांसफर कर दिया जाता था या नकद निकाल लिया जाता था।इसके बाद इस फंड का इस्तेमाल संस्थानों के कार्यों, संपत्ति खरीदने और दूसरे खर्च में किया जाता था। जांच में पता चला है कि इन पैसों को मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए अलग-अलग चल और अचल संपत्तियों में निवेश किया गया है। इससे वेलफेयर स्कीम का मकसद ही खत्म हो गया। ED ने लगभग 13.83 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियों को जब्त करने का प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किया है। इन संपत्तियों में हरिद्वार और रुड़की में मौजूद फिक्स्ड डिपॉजिट खाते,जमीन और शिक्षण/संस्थागत बिल्डिंग शामिल हैं।
