उत्तराखंड में एससी/एसटी एक्ट के तहत लोक सेवकों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला,मुकदमा दर्ज करने से पहले करानी होगी जांच।

उत्तराखंड में एससी/एसटी एक्ट के तहत लोक सेवकों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला,मुकदमा दर्ज करने से पहले करानी होगी जांच।

नैनीताल:-18 जून 2026

उत्तराखंड में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) अधिनियम के तहत लोक सेवकों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य में किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच कराना अनिवार्य होगा।

इनकी याचिका पर हुई सुनवाई⤵️

दरअसल, बुधवार यानी 17 जून को जस्टिस आलोक मेहरा की एकलपीठ ने तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) भूपेंद्र धोनी और उपनिरीक्षक (एसआई) रमेश बोहरा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। यह मामला हल्द्वानी के मुखानी थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सेशन कोर्ट यानी सत्र न्यायालय ने बिना प्रशासनिक जांच रिपोर्ट के लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का निर्देश देकर कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन किया है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में स्थापित सिद्धांतों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच में आरोपों की पुष्टि और संस्तुति आवश्यक है. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे।

क्या था मामला?

बता दें कि साल 2024 में नैनीताल की जिला एवं सत्र अदालत ने एक महिला की ओर से दायर परिवाद पर सुनवाई की थी, उस दौरान अदालत ने एक आरोपित युवक के साथ-साथ तत्कालीन सीओ और एसओ के खिलाफ भी एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था। महिला ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत दाखिल अर्जी में आरोप लगाया था कि उसके साथ जातिसूचक टिप्पणियां की गईं, साथ ही दुर्व्यवहार किया गया और मारपीट की गई। हालांकि, पुलिस जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई, जिसके चलते मुकदमा दर्ज नहीं किया गया था।

सेशन कोर्ट के आदेश के खिलाफ तत्कालीन सीओ भूपेंद्र धोनी और एसआई रमेश बोहरा ने नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. जिस पर सुनवाई करते हुए साफ आदेश दिया कि किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच अनिवार्य रूप से कराना होगा।

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