जंगली जानवरों से बचाव को पांच किमी क्षेत्र में बायो फेंसिंग की घेरबाड।

जंगली जानवरों से बचाव को पांच किमी क्षेत्र में बायो फेंसिंग की घेरबाड।

रामबांस के करीब दो लाख पौधे लगाए,ग्रामीणों को मिला रोजगार।

मेहलचौरी (गैरसैण)-07 सितंबर 2026
रिपोर्ट:- प्रेम संगेला

पहाड़ों में दिनों दिन बढ़ती जंगली जानवरों की सक्रियता के बीच वन विभाग अब बायो फेंसिंग के जरिए मानव और वन्यजीव संघर्ष कम करने की दिशा में नए प्रयोग कर रहा है। विकासखंड गैरसैंण के अंतर्गत मेहलचौरी बाजार के नजदीकी सिलंगा ग्राम पंचायत में बायोफेंसिंग योजना के तहत रामबांस के कांटेदार पौधों का रोपण कार्य वन विभाग द्वारा किया जा रहा है।

योजना के तहत करीब 11 लाख की लागत से 5 किलोमीटर लंबाई और 10 मीटर चौड़ाई के क्षेत्र में बायो फेंसिंग तैयार की जा रही है। सिलंगा ग्राम पंचायत के अंतर्गत उजेटिया से बदियासेम गांव के बीच सडक किनारे वन विभाग द्वारा ग्रामीणों की मदद से करीब दो लाख रामबांस के पौधे लगाए जा रहे हैं।वन विभाग का दावा है कि डेढ से दो वर्ष में पौधों के पूर्ण आकार में विकसित होने के बाद यह क्षेत्र प्राकृतिक बाडे का काम करेगा। जिससे वर्तमान में अतयधिक सक्रिय वन्य जीवों में शामिल गुलदार, बंदर ओर जंगली सूअर जैसे नुकसानदायक जानवरों के लिए गांव की ओर पहुंचना मुश्किल होगा। इससे एक ओर जहां गुलदार के हमले से मनुष्यों और गौवंश की सुरक्षा में मदद मिलेगी, वहीं बंदरों और जंगली सूअरों से फसलों को होने वाले नुकसान पर भी अंकुश लग सकेगा।

वन क्षेक्षेत्राधिकारी गैरसैंण नवल किशोर नेगी ने बताया कि बायो फेंसिंग भविष्य में जंगली जानवरों की आवाजाही को नियंत्रित करने में उपयोगी साबित होगी। रामबांस का पौधा स्थानीय जलवायु ओर प्रकृति के अनुकूल होने के साथ ही कम लागत से तैयार होने वाली ओर रखरखाव रहित योजना है। कम पानी और सूखे जैसी परिस्थितियों में भी आसानी से पनपने वाला पौधा कांटेदार होने के चलते जानवर भी इसे नुकसान नहीं पंहुचाते हैं ।वहीं योजना के निर्माण के दौरान ग्रामीणों को रोजगार भी उपलब्ध हो रहा है।बायोफेंसिंग योजना के दौरान उप वन क्षेत्राधिकारी अवतार सिंह रावत ,फॉरेस्टर जंगबीर बिष्ट, वनविट अधिकारी सरोप सिंह , शशि जोशी की देखरेख में पौधरोपण का कार्य पूर्ण किया गया।

औषधीय गुणों से भरपूर है रामबांस।

पहली नजर में अनुपयोगी नजर आने वाला रामबांस कई उपयोगी गुणों वाला पौधा है। जानकारों के अनुसार इसके पत्तों को सुखाकर डोरियां ओर रस्सीयां भी बनाई जाती हैं । इसके मोटे, रसीले और लंबे पत्तों का विभिन्न औषधीय कार्यों में भी इस्तेमाल किया जाता है।
इसका उपयोग सूजन और घाव आदि में एंटीसेप्टिक के तौर पर भी किया जाता है। स्थानीय स्तर पर इसके रस का उपयोग सिरदर्द समेत विभिन्न उपचारों में किए जाने की जानकारी भी मिलती है।

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