उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय से बर्खास्त कर्मचारियों के मामले पर हुई सुनवाई, साल 2016 से पहले नियुक्ति कर्मचारियों के नियुक्ति से संबंधित दस्तावेज पेश करने के आदेश।
नैनीताल:-17 सितंबर 2026
उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय से बर्खास्त कर्मचारियों के मामले पर आज हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान बर्खास्त कर्मचारियों की तरफ से प्रार्थना पत्र देकर कहा गया कि साल 2016 से पहले नियुक्ति कर्मचारियों के नियुक्ति के संबंधित दस्तावेज कोर्ट में पेश करने की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने सुनवाई के बाद उनकी ओर से दायर प्रार्थना पत्र को निरस्त कर दिया। साथ ही कहा कि साल 2016 से पहले नियुक्त कर्मचारियों के दस्तावेज शपथपत्र के माध्यम से कोर्ट में पेश करें और विधानसभा सचिवालय उस पर अपनी आपत्ति पेश करें।
अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी। आज मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की एकलपीठ में हुई। आज सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की तरफ से कहा गया कि उनकी नियुक्तियां वैध है,क्योंकि, विधानसभा के अध्यक्ष को नियुक्ति करने का अधिकार है। वहीं, विधानसभा सचिवालय की तरफ से कहा गया कि जितनी भी अवैध नियुक्तियां की गई थी, विधानसभा ने उन्हें नियमों के तहत हटा दिया है। जो नियुक्तियां की गई, वो बिना नियमावली को ध्यान में रखते हुए की गई थी। विधानसभा के अध्यक्ष को इस तरह नियुक्ति करने का कोई अधिकार नहीं है। बिना विज्ञप्ति जारी किए ही 228 कर्मचारियों को सचिवालय में नौकरी दे दी गई।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल,अपनी बर्खास्तगी के आदेश को बबिता भंडारी, कुलदीप सिंह, भूपेंद्र सिंह बिष्ट समेत 225 अन्य लोगों ने नैनीताल हाईकोर्ट की एकलपीठ में चुनौती दी है। याचिकाओं में कहा गया है कि विधानसभा अध्यक्ष की ओर से लोकहित को देखते हुए उनकी सेवाएं सिलसिलेवार 27, 28 और 29 सितंबर 2022 को समाप्त कर दी गई। बर्खास्तगी आदेश में किस आधार और किस कारण से हटाया गया, इसका कहीं भी जिक्र नहीं किया गया, ना ही उनकी सुनावाई हुई। जबकि, उन्होंने सचिवालय में नियमित कर्मचारियों की तरह ही काम किया है। एक साथ इतने कर्मचारियों को बर्खास्त करना लोकहित में नहीं माना जा सकता है, यह आदेश विधि विरुद्ध है। उनका कहना था कि उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय में साल 2001 से 2015 के बीच भी 396 पदों पर बैकडोर नियुक्तियां हुई है। जिनको नियमित भी किया जा चुका है,याचिकाओं में कहा गया है कि साल 2014 तक हुई तदर्थ नियुक्त कर्मियों को 4 साल से कम की सेवा में नियमित नियुक्ति दे दी गई,लेकिन उन्हें 6 साल के बाद भी नियमित नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्हें नियमित करने की बजाय हटा दिया गया। इससे पहले उनकी नियुक्ति को साल 2018 में जनहित याचिका दायर कर चुनौती दी गई थी। जिसमें कोर्ट ने उनके हित में आदेश देकर माना था कि उनकी नियुक्ति वैध है। जबकि, नियमानुसार 6 महीने की नियमित सेवा के बाद उन्हें नियमित किया जाना था।
