चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात: डेढ़ दिन के सत्र के बाद अंधेरे में डूबी ग्रीष्मकालीन राजधानी,आंदोलनकारी बोले छली गई गैरसैंण की जनता।
गैरसैंण:- 29 अक्टूबर 2026
रिपोर्ट:-पुष्कर सिंह रावत
“चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात” यह कहावत उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण पर एक बार फिर बिल्कुल सटीक साबित हुई है। दो दिनों तक रंग-बिरंगी व दूधिया रोशनी से जगमगा रहा आलीशान विधानसभा भवन और पूरा परिसर अब फिर से घने अंधेरे और सन्नाटे की आगोश में समा चुका है। माननीयों और बड़े अफसरों की गाड़ियों के हूटरों का जो कानफोड़ू शोर पिछले दो दिनों से पूरी घाटी में गूंज रहा था, वह अब थम गया है। जहां भारी चहल-पहल, वीआईपी आवाजाही और भारी सुरक्षा घेरा था, वहां अब ऐसी वीरानी छा गई है मानो इस वीरान पहाड़ पर कोई रहता ही न हो।
डेढ़ दिन का वीआईपी तमाशा, जनता को मिली सिर्फ मायूसी
बीती 27 अक्टूबर से आयोजित इस विधानसभा सत्र के दौरान गैरसैंण से लेकर भराड़ीसैंण, कर्णप्रयाग और कालेश्वर तक भारी गहमागहमी रही। एक तरफ जहां अधिकारियों और मंत्रियों का काफिला दौड़ रहा था,वहीं दूसरी तरफ अपनी मांगों को लेकर आए प्रदर्शनकारियों की नारेबाजी से आसमान गूंज रहा था. लेकिन हर बार की तरह इस बार भी उत्तराखंड की जनभावनाओं से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल पीछे छूट गया कि आखिर इस ‘डेढ़ दिन’ के सत्र से गैरसैंण को क्या मिला?
क्षेत्रीय जनता इस बार इस उम्मीद के साथ टकटकी लगाए बैठी थी कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार गैरसैंण की तकदीर बदलने वाली कोई ऐतिहासिक घोषणा करेगी. विशेषकर गैरसैंण को नया जिला बनाए जाने की चर्चाओं से स्थानीय लोग बेहद उत्साहित थे.लेकिन जनभावनाओं पर तब कुठाराघात हो गया, जब बिना प्रश्नकाल के ही सत्र को आनन-फानन में अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इस दौरान न तो विधायक अपने क्षेत्रों की बुनियादी समस्याएं सदन में उठा पाए और न ही सरकार ने गैरसैंण के लिए कोई बड़ी राहत दी.हाथ लगी तो सिर्फ और सिर्फ मायूसी.
टैक्सपेयर्स के करोड़ों स्वाहा; वीआईपी कमरों में ऐश,कड़कड़ाती ठंड में जवान बेहाल
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि,इस डेढ़ दिन के ‘सियासी ड्रामे’ के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए। नेताओं और नौकरशाहों के खाने-पीने, ठहरने और आलीशान गाड़ियों के ईंधन पर पानी की तरह बजट फूंका गया। माननीयों और अफसरों के वीआईपी कमरों में हीटर से लेकर तमाम ऐशो-आराम की सुविधाएं मौजूद थीं, वहीं दूसरी ओर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में कानून-व्यवस्था संभालने पहुंचे सुरक्षा बल के जवानों को कड़कड़ाती ठंड के बीच भारी दिक्कतों और अव्यवस्थाओं से दो-चार होना पड़ा।
“यह सिर्फ बजटीय डकैती और सियासी पर्यटन”:आंदोलनकारी व सामाजिक कार्यकर्ता
सरकार के इस रवैये को लेकर उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों और क्षेत्रीय जनता ने बेहद तीखे सवाल खड़े किए हैं. वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी सुरेश कुमार बिष्ट, हरिकृष्ण भट्ट और हरेंद्र कंडारी ने सत्र की अवधि पर सवाल उठाते हुए कहा, “यदि सरकार को मात्र डेढ़ दिन का ही सत्र चलाना था, तो करोड़ों रुपये फूंककर पूरी फौज के साथ गैरसैंण आने का क्या औचित्य था? यह काम देहरादून में बैठकर भी आसानी से हो सकता था. भाजपा सरकार केवल पहाड़ की जनता को छल रही है और गैरसैंण को मात्र ‘सियासी पर्यटन’ का केंद्र बना दिया है. चुनाव नजदीक आते ही इन्हें गैरसैंण की याद सताने लगती है. कहा कि,सरकार में दम था तो गैरसैंण को स्थायी राजधानी और जिला घोषित क्यों नहीं किया? कहा कि,इसका करारा जवाब उत्तराखंड की जनता 2027 के चुनाव में इस सरकार को देगी।
स्थायी राजधानी संयुक्त संघर्ष समिति के अध्यक्ष नारायण सिंह बिष्ट ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि सरकार को गैरसैंण और पहाड़ के सरोकारों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा,अगर सरकार गैरसैंण की इतनी ही हितैषी है, तो इसे पूर्ण स्थायी राजधानी क्यों नहीं घोषित करती? इस समय तो सरकार के पास पूरा मौका और बहुमत था, लेकिन केवल जनता को ठगने और करोड़ों के सरकारी बजट को ठिकाने लगाने का काम किया गया है.
वहीं, गैरसैंण विकासखंड के खनसर क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता व पूर्व जिला पंचायत सदस्य अवतार सिंह पुंडीर ने इस सत्र को जनता के टैक्स के पैसों की खुली बर्बादी करार दिया. उन्होंने कहा,यह सत्र सिर्फ और सिर्फ सरकारी खजाने को ठिकाने लगाने के सिवाय कुछ नहीं था. देहरादून के हुक्मरान और अफसर दो दिन के लिए पहाड़ पर मौज-मस्ती और पिकनिक मनाने आते हैं और फिर वापस अपनी सुख-सुविधाओं वाले दफ्तरों में लौट जाते हैं. सत्र के नाम पर झूठी वाह-वाही लूटने का यह खेल अब पहाड़ की जनता भली-भांति समझ चुकी है. उन्होंने कहा कि,खनसर क्षेत्र कर्णप्रयाग विधानसभा का सबसे दूरस्थ क्षेत्र है और इस बार इस सत्र से खनसर वाशियों को भी बड़ी उम्मीदें थी,लेकिन निराश हाथ लगी.
सत्र खत्म होते ही नेताओं और अफसरों की गाड़ियां देहरादून की तरफ दौड़ गईं और गैरसैंण की किस्मत एक बार फिर अगले सत्र तक के लिए ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।
