नैनीताल हाईकोर्ट ने बॉन्डधारी डॉक्टरों को राहत देते हुए उनके दुर्गम सेवा क्षेत्र पर सुनाया बड़ा फैसला।

नैनीताल हाईकोर्ट ने बॉन्डधारी डॉक्टरों को राहत देते हुए उनके दुर्गम सेवा क्षेत्र पर सुनाया बड़ा फैसला।

नैनीताल-15 अप्रैल 2026

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एमबीबीएस के बाद पीजी करने वाले डॉक्टरों के सेवा बॉन्ड को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी छात्र ने एमबीबीएस पूरा करने के बाद और पीजी में प्रवेश लेने से पहले दुर्गम क्षेत्रों में सेवा दी है, तो उस अवधि को उनके पीजी के बाद की अनिवार्य तीन साल की सेवा अवधि में जोड़ा जाएगा। कोर्ट ने पिछले दिनों राज्य सरकार की विशेष अपील को निस्तारित करते हुए यह आदेश दिया है।

​यह मामला तब शुरू हुआ जब डॉ. मेहुल सिंह गुंज्याल और अन्य ने सरकार के उस नियम को चुनौती दी थी। जिसमें पीजी के बाद फिर से पूरे समय के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में सेवा देने का दबाव बनाया जा रहा था. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उन्होंने पीजी प्रवेश से पहले ही बॉन्ड के तहत कुछ समय की सेवा दे दी है। जिसे उनकी कुल सेवा अवधि में समायोजित किया जाना चाहिए। इस मामले में पूर्व में एकल पीठ ने भी डॉक्टरों के पक्ष में फैसला सुनाया था। ​

अदालत की कार्यवाही के दौरान सरकारी आदेशों का हवाला देते हुए बताया गया कि 23 जुलाई 2008 के शासनादेश के अनुसार,एमबीबीएस के बाद 5 वर्ष और पीजी के बाद 3 वर्ष की सेवा अनिवार्य है। यदि कोई डॉक्टर यह सेवा नहीं देता है, तो उसे 15 लाख रुपये की बॉन्ड राशि सरकार को चुकानी होगी।याचिकाकर्ताओं में से अधिकांश ने निजी मेडिकल कॉलेजों से पीजी किया था, जबकि एक छात्र ने सरकारी कॉलेज से डिग्री प्राप्त की थी। ​राज्य सरकार ने अपील के दौरान यह आशंका जताई थी कि यदि इस तरह की छूट दी गई, तो बॉन्ड की राशि वसूलने में कठिनाई हो सकती है। सरकार का कहना था कि यदि डॉक्टर पीजी के बाद निर्धारित सेवा देने में विफल रहते हैं, तो सरकार को उनसे बॉन्ड का पैसा लेने का पूरा अधिकार होना चाहिए। इस पर कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट करते हुए सरकार की चिंता को भी संबोधित किया। पीठ ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के पास बॉन्ड की राशि वसूलने का अधिकार सुरक्षित रहेगा, बशर्ते याचिकाकर्ता पीजी के बाद आवश्यक सेवा की शर्तों का उल्लंघन करें।हालांकि, राहत की बात यह है कि तीन साल की कुल सेवा अवधि की गणना करते समय, उनके द्वारा एमबीबीएस के बाद दी गई पिछली सेवा को भी गिना जाएगा। यानी अगर किसी ने पहले एक साल सेवा दी है, तो उसे पीजी के बाद केवल दो साल और सेवा देनी होगी।इस फैसले से उन दर्जनों डॉक्टरों को बड़ी राहत मिली है जो उच्च शिक्षा के बाद सरकारी बॉन्ड और पहाड़ों में सेवा की दोहरी शर्तों के बीच फंसे हुए थे। अदालत ने देरी से अपील दायर करने के लिए सरकार की 127 दिनों की देरी को भी माफ कर दिया। इस विवाद का अंतिम रूप से निपटारा कर दिया। इस आदेश के साथ ही मामले से जुड़ी अन्य सभी लंबित अर्जियां भी समाप्त कर दी गई हैं।

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