दो जगह मतदाता सूची में नाम होने पर ग‌ई ग्राम प्रधान की कुर्सी।

दो जगह मतदाता सूची में नाम होने पर ग‌ई ग्राम प्रधान की कुर्सी।

नैनीताल-29 मार्च 2026

उत्तराखण्ड के नैनीताल जिले से पंचायत चुनावों के संबंध में एक बड़ी खबर सामने आ रही है। जी हां… लोकतंत्र में एक वोट की कीमत कितनी होती है, यह धारी तहसील क्षेत्र के धानाचूली की भदरेठा ग्राम पंचायत के ताजा फैसले ने फिर साबित कर दिया। यहां प्रधान पद का चुनाव जीतने वाली प्रत्याशी की जीत को अब निरस्त कर दिया गया है, और दूसरा स्थान पाने वाले उम्मीदवार को प्रधान घोषित करने का रास्ता साफ हो गया है।

➡️शिकायत से पलटा पूरा नतीजा⤵️

मामला उस समय सामने आया जब चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे प्रत्याशी निर्मल सिंह ने एसडीएम न्यायालय में याचिका दायर की। आरोप था कि विजेता प्रत्याशी आशा मटियाली का नाम एक नहीं, बल्कि दो अलग-अलग स्थानों की मतदाता सूची में दर्ज है, जो नियमों के खिलाफ है। इस आधार पर नामांकन को अवैध ठहराने की मांग की गई।

➡️जांच में सही पाए गए आरोप⤵️

धारी एसडीएम अंशुल भट्ट ने पूरे प्रकरण की सुनवाई के बाद पाया कि आपत्ति तथ्यात्मक है। आदेश में स्पष्ट किया गया कि संबंधित प्रत्याशी का नाम गांव की मतदाता सूची के साथ ही हल्द्वानी नगर निगम की मतदाता सूची में भी दर्ज था। दो जगह दर्ज होना चुनावी नियमों का उल्लंघन है। इसके चलते उनका नामांकन अमान्य माना गया और उनके पक्ष में पड़े सभी मत भी शून्य घोषित कर दिए गए। सबसे खास बात तो यह है कि इस फैसले से राज्य के उन सभी पंचायत चुनाव विजेता प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ना तय है जिनके नाम दो जगह मतदाता सूची में थे। गौरतलब हो कि यह मामला पंचायत चुनावों के दौरान भी जमकर तूल पकड़ा था।

➡️एक वोट का फर्क बना निर्णायक⤵️

इस चुनाव की खास बात यह रही कि दोनों प्रत्याशियों के बीच जीत का अंतर महज एक वोट का था। ऐसे में नियमों के उल्लंघन का प्रभाव सीधे परिणाम पर पड़ा और पूरी तस्वीर बदल गई।

➡️दूसरे नंबर पर रहे प्रत्याशी को मिलेगा पद⤵️

एसडीएम के आदेश के अनुसार अब दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार को ग्राम प्रधान घोषित किया जाएगा। इसके लिए निर्देश जिला पंचायत कार्यालय को भेज दिए गए हैं, जहां से औपचारिक घोषणा की प्रक्रिया पूरी होगी।

➡️नियमों की अनदेखी पड़ी भारी⤵️

आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि नामांकन के समय ही इस आपत्ति पर उचित कार्रवाई होनी चाहिए थी। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के बावजूद इस पहलू को नजरअंदाज किया गया, जिसका परिणाम अब सामने है।

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