कश्मीर से कन्याकुमारी तक के शिक्षाविद रामनगर में जुटे, ‘मंथन 2.0’ में शिक्षा के भविष्य पर महामंथन।
रामनगर (नैनीताल):-19 सितंबर 2026
कन्याकुमारी से कश्मीर और लद्दाख तक देशभर के शिक्षाविद उत्तराखंड के रामनगर में जुटे हैं,मौका है NISA यानी नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस के मंथन 2.0 का, जहां KG से PG तक शिक्षा व्यवस्था के बीच मौजूद गैप, बच्चों के सर्वांगीण विकास, रोजगारपरक शिक्षा, सरकारी और स्वयंपोषित विद्यालयों के बीच समानता और स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है,इसी मंच से NISA के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने शिक्षा व्यवस्था और स्वयंपोषित विद्यालयों को लेकर कई अहम सुझाव रखे।
रामनगर में आयोजित मंथन 2.0 में देश के अलग-अलग राज्यों से शिक्षाविद, स्कूल संचालक और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधि शामिल हुए हैं,आयोजकों के मुताबिक चार सौ से अधिक प्रतिनिधियों के इस मंथन का उद्देश्य सिर्फ समस्याओं पर चर्चा करना नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए ऐसे सुझाव सामने लाना है, जिन्हें नीति और जमीनी स्तर पर लागू किया जा सके।मंथन में KG से PG तक बच्चे की पूरी शैक्षणिक यात्रा को एक निरंतर प्रक्रिया के तौर पर देखने पर जोर दिया गया। वक्ताओं का कहना है कि प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच यदि गैप रहेगा तो बच्चों के सर्वांगीण विकास पर असर पड़ेगा। इसलिए गुणवत्तापूर्ण, रोजगारपरक और व्यावहारिक शिक्षा को एक साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है.इसी दौरान NISA के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने निजी स्कूल, शब्दावली को लेकर अपनी बात रखी,उनका कहना है कि ट्रस्ट और सोसाइटी के माध्यम से संचालित तथा सरकार से मान्यता प्राप्त विद्यालयों को केवल निजी स्कूल कहना उचित नहीं है। उन्होंने कहाँ हमें निजी स्कूल न कहें,ये स्कूल ट्रस्ट और सोसाइटी के माध्यम से चलते हैं, निर्धारित मानक पूरे करते हैं और सरकार के निरीक्षण के बाद मान्यता प्राप्त करते हैं। इसलिए इन्हें स्वयंपोषित और मान्यता प्राप्त स्कूल कहना ज्यादा उचित होगा।
कुलभूषण शर्मा ने कहा कि ऐसे विद्यालयों को सरकार द्वारा निर्धारित मानकों और नियमों का पालन करना पड़ता है,उनका तर्क है कि इन स्कूलों की भूमिका को केवल निजी व्यवसाय के रूप में देखने के बजाय शिक्षा व्यवस्था के एक हिस्से के तौर पर समझने की जरूरत है.उन्होंने सरकारी और स्वयंपोषित विद्यालयों के बीच कथित असमान व्यवहार का मुद्दा भी उठाया और स्टेट स्कूल स्टैंडर्ड अथॉरिटी जैसी व्यवस्था के माध्यम से समान मानकों और नीतियों पर विचार करने की बात कही.शर्मा ने शिक्षक और विद्यार्थी के बीच सम्मान को भी शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद बताया. उनका कहना है कि जब तक शिक्षक और बच्चों के बीच परस्पर सम्मान और सकारात्मक वातावरण नहीं बनेगा, तब तक बेहतर राष्ट्र निर्माण की दिशा में अपेक्षित परिणाम हासिल करना मुश्किल होगा।
मंथन 2.0 में RTE यानी शिक्षा के अधिकार और शिक्षा में DBT का प्रस्ताव भी चर्चा में रहा, कुलभूषण शर्मा ने कहा कि शिक्षा का अधिकार केवल 25 प्रतिशत बच्चों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सभी बच्चों की पहुंच सुनिश्चित करने पर विचार होना चाहिए। सरकारी स्कूलों में प्रति विद्यार्थी होने वाले खर्च और स्वयंपोषित विद्यालयों की फीस के अंतर का उल्लेख करते हुए उन्होंने एजुकेशन में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की संभावित व्यवस्था पर विचार करने की मांग रखी. उनका सुझाव है कि यदि कोई परिवार अपनी पसंद से मान्यता प्राप्त स्वयंपोषित विद्यालय चुनता है, तो सरकार की ओर से निर्धारित सहायता राशि का कोई मॉडल सीधे बच्चे या अभिभावक तक पहुंचाने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है,हालांकि, यह प्रस्ताव फिलहाल NISA की ओर से रखा गया सुझाव है,इसे लागू करने के लिए सरकार को वित्तीय, प्रशासनिक और नियामकीय पहलुओं पर विचार करना होगा।
मंथन में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं का मुद्दा भी उठा,आयोजकों के मुताबिक देश के कई दूरदराज क्षेत्रों में संचालित विद्यालय अभी भी पर्याप्त पेयजल जैसी सुविधाओं से जूझ रहे हैं, कई जगह सरकारी पाइपलाइन नहीं पहुंचने के कारण स्कूलों को ट्यूबवेल या अन्य स्थानीय जल स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। आयोजकों ने मांग की कि जिस तरह घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने की योजनाओं पर काम किया जा रहा है, उसी तरह विद्यालयों को भी प्राथमिकता के आधार पर सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए। तराई इंडिपेंडेंस स्कूल के अध्यक्ष अनुराग के सिंह ने शिक्षाविदों से मंथन 2.0 का हिस्सा बनकर नए विचार सामने रखने की अपील की। वहीं रामनगर के प्रसून श्रीवास्तव ने कहा कि सरकार की नीतियों को केवल कागजों तक सीमित रखने के बजाय उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए शिक्षा जगत को भी आगे आना होगा।
मंथन में राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी NEP के क्रियान्वयन और विकसित भारत के लक्ष्य में शिक्षा की भूमिका पर भी चर्चा हुई, वक्ताओं का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था के विभिन्न हिस्सों के बीच बेहतर समन्वय और समान अवसर उपलब्ध कराकर ही देश के समग्र विकास की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।रामनगर का यह मंथन इसलिए भी अहम है क्योंकि यहां शिक्षा से जुड़े सवालों पर अलग-अलग राज्यों के अनुभव एक मंच पर आए हैं. अब देखने वाली बात यह होगी कि मंथन 2.0 से निकलने वाले सुझावों में से कितने सुझाव नीति-निर्माण और स्कूलों की जमीनी व्यवस्था तक पहुंचते हैं।
