नैनीताल हाईकोर्ट ने कोटद्वार प्रॉपर्टी डीलर सुमित पटवाल हत्या केस में निचली अदालत का फैसला पलटा,तीनों आरोपियों को जेल से रिहा करने के दिए आदेश।

नैनीताल हाईकोर्ट ने कोटद्वार प्रॉपर्टी डीलर सुमित पटवाल हत्या केस में निचली अदालत का फैसला पलटा,तीनों आरोपियों को जेल से रिहा करने के दिए आदेश।

नैनीताल-10 जनवरी 2026

कोटद्वार के चर्चित सुमित पटवाल हत्याकांड मामले में नैनीताल हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया। साथ ही तीनों आरोपी विशाल उर्फ जॉली, जोनी शर्मा और दीपक सिंह रावत को बरी करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और पुख्ता सबूत पेश करने में विफल रहा है। जिसके बाद तीनों आरोपियों को बरी कर दिया गया है।

कोटद्वार में हुई थी प्रॉपर्टी डीलर सुमित पटवाल की हत्या⤵️

दरअसल, यह मामला 22 मार्च 2015 का है. जब कोटद्वार के बेलाघाट क्रॉसिंग पर बाइक सवार हमलावरों ने प्रॉपर्टी डीलर सुमित पटवाल की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में निचली अदालत ने विशाल और जोनी को हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जबकि, दीपक रावत को धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराया गया था। वहीं, चौथे आरोपी सुरेंद्र सिंह की अपील लंबित रहने के दौरान मौत हो गई थी। वहीं, अब हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से सीसीटीवी फुटेज की साख पर सवाल उठाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 बी के तहत अनिवार्य प्रमाण पत्र के बिना इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सबूत के तौर पर नहीं पढ़ा जा सकता। इसके अलावा पहचान मेमो में गवाहों की ओर से आरोपी दीपक रावत की पहचान को लेकर दिए गए बयानों में भी विरोधाभास पाया गया।

कई गवाहों का आरोप, पुलिस ने जबरन करवाए हस्ताक्षर⤵️

कोर्ट ने ये भी गौर किया कि इस मामले में कोई भी चश्मदीद गवाह अभियोजन पक्ष के समर्थन में नहीं खड़ा हुआ। कई महत्वपूर्ण गवाहों ने मुकरते हुए कहा कि पुलिस ने उनसे जबरन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए थे। चश्मदीद साक्ष्यों की कमी के कारण अभियोजन की कहानी पूरी तरह से कमजोर साबित हुई।

पिस्तौल की बरामदगी पर कोर्ट की टिप्पणी⤵️

हथियारों की बरामदगी को लेकर भी कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की। फैसले में कहा गया कि जोनी शर्मा और विशाल के पास से पिस्तौल की बरामदगी सार्वजनिक व खुले स्थानों से हुई थी, जिस पर किसी का भी नियंत्रण हो सकता था। कानून के अनुसार, सार्वजनिक स्थानों से हुई ऐसी बरामदगी को आरोपी के खिलाफ निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता।

फॉरेंसिक रिपोर्ट में भी भिन्नता⤵️

वहीं, फॉरेंसिक रिपोर्ट के संबंध में कोर्ट ने पाया कि शव से निकाली गई गोलियों की सुरक्षित अभिरक्षा की कड़ियों में स्पष्ट अंतराल था। पुलिस ये साबित नहीं कर सकी कि डॉक्टर की ओर से सौंपी गई गोलियां मजिस्ट्रेट तक पहुंचने और फॉरेंसिक लैब भेजे जाने तक पूरी तरह सुरक्षित एवं सील बंद थीं। इस खामी के कारण फॉरेंसिक रिपोर्ट का लाभ अभियोजन को नहीं मिला। सुमित पटवाल (मृतक) की ओर से पूर्व में लिखी गई एक चिट्ठी को भी कोर्ट ने दुश्मनी का आधार मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल हस्ताक्षर की पहचान कर लेने से दस्तावेज के भीतर लिखी गई बातों की सत्यता प्रमाणित नहीं हो जाती, विशेषकर तब जब वो एक फोटोकॉपी दस्तावेज हो।

कोर्ट ने तीनों को जेल से रिहा करने के दिए आदेश⤵️

हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में घटनाओं की श्रृंखला अधूरी है और संदेह का लाभ आरोपियों को मिलना चाहिए। कोर्ट ने तीनों अपीलकर्ताओं को तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश दिया है।

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