अपने संसाधनों पर ग्रामीण करते आ रहे कोदियाबगड़ मेले का आयोजन,सरकारों की उपेक्षा से आहत हैं ग्रामीण,अब तक मुख्यमंत्री के रूप में पंहुचने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत एकमात्र नेता।

अपने संसाधनों पर ग्रामीण करते आ रहे कोदियाबगड़ मेले का आयोजन,सरकारों की उपेक्षा से आहत हैं ग्रामीण।

अब तक मुख्यमंत्री के रूप में पंहुचने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत एकमात्र नेता।

गैरसैंण-12 जून 2026
रिपोर्ट- प्रेम संगेला

पेशावर कांड के महानायक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की स्मृति में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला मेला इस वर्ष भी 12 जून को उनकी समाधि स्थल कोदियाबगड़, दूधातोली में आयोजित किया गया। उत्तराखंड का पामिर कहा जाने वाला दुधातोली का कोदियाबगड़ बुग्याल गैरसैंण नगर से कुल 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। समुद्रतल से 3100 मीटर की ऊँचाई लिए हुए यह पर्वतमाला बेहद रमणीक स्थलों में शुमार है। मध्य हिमालयी इस क्षेत्र में स्थित इस बुग्याल में कभी सैकडों की संख्या में अपने पालतु पशुओं के साथ यहां रहने वाले पशुपालकों द्वारा दुग्ध उत्पादन का केन्द्र होने के चलते इसे दुधातोली (दुध की तौली या बर्तन ) नाम दिया गया था।

गैरसैंण से 16 किलोमीटर दूर भराड़ीसैंण व दो किलोमीटर वन विभाग की सडक से सफर करने के बाद 6 किलोमीटर की खडी चढ़ाई पार कर यहां पँहुचा जाता है। चमोली ,अल्मोडा व पौडी जनपदों के इस सीमांत क्षेत्र कोदियाबगड़ में चौमास (बरसात के चार माह ) के दौरान यहां छपरों (कच्चे मकान ) में रहने वाले पशुपालकों द्वारा सदियों से मेले का आयोजन किया जाता रहा है ,जिसमें गैरसैंण, थलीसैंण व स्यालदे ब्लाकों के पशुपालक शामिल रहते हैं। बदलते समय के साथ पशुपालन कम होने से मेले की रंगत भी फिकी पडती गयी । लेकिन पिछले साल से मेले की खौयी रंगत लोटाने को गैरसैंण नगर पंचायत के अध्यक्ष सहित स्थानीय ग्रामीणों ने प्रयास शुरू किये हैं । इसी कडी में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के समाधी स्थल पर स्थापित जीर्ण -शीर्ण मूर्ति के स्थान पर नई मूर्ती स्थापित की गयी है।

मेले को पूर्व की भांती लोकप्रिय बनाने के लिए प्रयासरत मोहन भंडारी ने कहा की वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का सम्पूर्ण जीवन प्रेरणादाई रहा है,जहां एक सैनिक के रूप में उनके अंदर अद्वितीय साहस एंव देशभक्ति का जज्बा था,तो वहीं दूसरी तरफ सामाजिक जीवन में उनकी जनसेवाएं हमेशा अविस्मरणीय रहेंगी.उन्होंने कहा की अन्याय और दमन के विरुद्ध खड़े होकर गढवाली जी ने मानवता एवं राष्ट्रहित का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया था।उनके आदर्शों को स्मृति मेले के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी का दायित्व है।

गौरतलब है की अब तक सरकारों ने इस मेले को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई है ,अब तक केवल पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ही अपने मुख्यमंत्रित्व काल में यहां पंहुच श्रद्धांजलि देने वाले एकमात्र नेता रहे हैं।

वीर चंद्र गढवाली की वीरगाथा⤵️

जनपद पौडी गढवाल के थलीसैंण ब्लाक के मासौं गांव के रहने वाले चन्द्र सिंह नेगी प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना की प्रसिद्ध ‘रॉयल गढ़वाल राइफल्स’ का हिस्सा थे,23 अप्रैल 1930 को पेशावर में निहत्थे पठानी स्वतंत्रता सेनानियों पर अंग्रेजों ने गोली चलाने का आदेश दिया था,तब उन्होंने अपनी देशभक्ति दिखाते हुए निहत्थे हमवतन क्रांतिकारियों पर गोली चलाने से साफ इनकार कर दिया। जिसके बाद हवलदार मेजर के रूप में उन्हें ब्रिटिश सेना से बर्खास्त कर दिया गया.उनके इस क्रांतिकारी फैसले के बाद उन्हें वीर चंद्र सिंह गढ़वाली नाम से जाना जाने लगा। सामाजिक सरोकारों से लगाव रखने वाले वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने सन् 1979 में अपनी मौत से पहले उन्होंने पशुपालकों के प्रिय स्थल कोदियाबगड़ में अपनी समाधी स्थापित करने की मंशा जताई थी।

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