चमोली के वाण गांव में स्थित प्राचीन लाटू मंदिर परिसर में नहीं दी जाएगी पशु बलि,ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से लिया ऐतिहासिक फैसला।

चमोली के वाण गांव में स्थित प्राचीन लाटू मंदिर परिसर में नहीं दी जाएगी पशु बलि,ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से लिया ऐतिहासिक फैसला।

देवाल (चमोली)- 06 अप्रैल 2026

देवाल विकासखंड के वाण गांव स्थित प्राचीन लाटू मंदिर में पशु बलि प्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। यह फैसला मंदिर समिति और ग्रामीणों की सर्वसम्मति से आयोजित बैठक में लिया गया, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए।

लाटू देवता मंदिर परिसर में नहीं दी जाएगी पशु बलि⤵️

इस बैठक में तय किया गया कि अब मंदिर परिसर में किसी भी प्रकार की पशु बलि नहीं दी जाएगी। मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु केवल सात्विक पूजा-अर्चना करेंगे. ग्रामीणों ने इसे सामाजिक सुधार और धार्मिक परंपराओं में सकारात्मक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। लाटू देवता मंदिर समिति के सदस्यों का कहना है कि समय के साथ धार्मिक आस्थाओं में बदलाव आवश्यक है। इस निर्णय का उद्देश्य आस्था को बनाए रखते हुए मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देना है। अब मंदिर में सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरी तरह सात्विक पद्धति से संपन्न किए जाएंगे।

वाण गांव की ग्राम प्रधान नंदुली देवी ने भी इस फैसले की पुष्टि करते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी साझा की है कि सिद्ध पीठ लाटू मंदिर में अब पशु बलि पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी। ग्रामीणों ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में एक बड़ी पहल बताया है। साथ ही बैठक में मंदिर परिसर की स्वच्छता और व्यवस्थाओं को और बेहतर बनाने का भी संकल्प लिया गया।

कौन हैं लाटू देवता?⤵️

लाटू देवता को मां नंदा देवी का धर्म भाई माना जाता है। उत्तराखंड की प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा में लाटू देवता की विशेष भूमिका होती है। जब यह यात्रा आयोजित होती है, तो सबसे पहले लाटू देवता का निशान मां नंदा देवी की अगुवाई करता है।

आंखों और मुंह पर पट्टी बांधकर गर्भगृह में जाते हैं पुजारी⤵️

वाण गांव का लाटू मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मंदिर क्षेत्रीय आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां हर साल काफी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इतना ही नहीं लाटू मंदिर के कपाट खुलने पर मुख्य पुजारी अपनी आंखों और मुंह पर पट्टी बांधकर गर्भगृह में प्रवेश कर पूजा करते हैं. जबकि, आज तक श्रद्धालु भगवान के दर्शन नहीं कर पाए हैं।

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