चमोली जनपद के ज्योतिर्मठ स्थित नृसिंह मंदिर प्रांगण में पौराणिक परंपरा अनुसार बदरीनाथ धाम की यात्रा शुरू होने से पूर्व आयोजित हुआ तिमुण्डया कौथीग।

चमोली जनपद के ज्योतिर्मठ स्थित नृसिंह मंदिर प्रांगण में पौराणिक परंपरा अनुसार बदरीनाथ धाम की यात्रा शुरू होने से पूर्व आयोजित हुआ तिमुण्डया कौथीग।

जोतिर्मठ (चमोली)- 18 अप्रैल 2026

भगवान बद्रीविशाल के कपाट खुलने से पूर्व मान्य पौराणिक एवं धार्मिक परंपरा के अनुसार शनिवार को तिमुण्डा मेला बड़े ही उत्साह के साथ संपन्न हो गया। देवपुजाई समिति के तत्वाधान मे आयोजित होने वाले तिमुण्डा मेले इस बार तिमुण्डा बीर के नए पश्वा को अवतरित होना था, जिसकी प्रक्रिया भी मेले के तय दिवस पर ही संपन्न की जानी थी। इसलिए सभी देवी देवताओं की मौजूदगी मे नए पश्वा के अवतरित होने की प्रक्रिया के तहत बैजवाड़ी परिवार के दोनों भाइयों को प्रक्रिया मे शामिल किया गया।नवदुर्गा, भुवनेश्वरी, चंडीका एवं दाणी देवियों के पश्वा अवतरित हुए और इसके बाद छोटे भाई कन्हैया बैजवाड़ी पर तिमुण्डा बीर का पश्वा अवतरित हुआ।नए अवतरित हुए तिमुण्डा बीर पश्वा ने मठागण मे दुर्गा जी के आलम के चारों ओर घूमते हुए बकरे का कच्चा मांस, कच्चे चांवल, गुड़ व पानी का सेवन किया। इस पूरी प्रक्रिया को नजदीक से देखने के लिए हजारों की संख्या मे लोग पहुंचे थे।

ये है तिमुण्डया की मान्यता—

माना जाता है तिमुण्डया तीन सिर वाला वीर था और एक सिर से दिशा का अवलोकन, एक सिर से मांस खाना और एक सिर से वेदों का अध्ययन करता था ह्यूना के जगलों में इस राक्षस ने बड़ा आतंक मचा रखा था और हर दिन मनुष्य को खाता था। एक दिन माँ दुर्गा देवयात्रा पर थी। गांव वाले मां के स्वागत के लिये नहीं आये, पूछने पर पता चला की लोग तिमुण्डया राक्षस के डर से घर से बाहर नहीं निकल रहे है और वो हर दिन एक मनुष्य को खाता है। हर दिन एक मनुष्य नरबलि के लिये जाता है। मां दुर्गा के कहने पर उस दिन कोई नहीं जाता है, तो क्रोधित तिमुण्डया गर्जना करते हुये गांव में पहुँचता है। मां नवदुर्गा और तिमुण्डया का भयंकर युद्ध होता है। माँ नवदुर्गा उसके तीन में से दो सर काट देती है। एक सिर कटकर सेलंग गांव के आसपास गिरता है उसे पटपटवा वीर और एक उर्गम के पास हिस्वा राक्षस कहते है और ज्यो ही नवदुर्गा माँ तिमुण्डया का तीसरा सिर काटने लगती है तो तिमुण्डया राक्षस माँ के शरणागत हो जाता है और माँ उसकी वीरता से बहुत प्रसन्न होती है और उसे अपना वीर बना देती है और आदेश देती है, आज से वो मनुष्य का भक्षण नहीं करेगा। साल में एक बार उसे एक पशु बकरी की बलि और अन्य खाना दिया जायेगा, तब से ये परम्परा चली आ रही है।

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