उम्मीदों के पहाड़ पर सियासत का ‘गैरसैंण’, 300 करोड़ खर्च होने के बाद भी स्थायी राजधानी का सवाल बरकरा

उम्मीदों के पहाड़ पर सियासत का ‘गैरसैंण’, 300 करोड़ खर्च होने के बाद भी स्थायी राजधानी का सवाल बरकरार।

सत्र के नाम पर पैसों की बर्बादी बंद हो,गैरसैंण को स्थायी राजधानी व जिला घोषित करे सरकार-राज्य आंदोलनकारी

गैरसैंण:- 26 अक्टूबर 2026
रिपोर्ट-पुष्कर सिंह रावत

उत्तराखंड की पंचम विधानसभा का वर्ष 2026 का तृतीय सत्र आगामी 27 अक्टूबर से गैरसैंण के भराड़ीसैंण विधानसभा भवन में आहूत होने जा रहा है। राज्यपाल की स्वीकृति के बाद अधिकारी कर्मचारी विधानसभा सत्र की तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे है। लेकिन, इस सरकारी हलचल के बीच पहाड़ का एक बुनियादी और सबसे बड़ा सवाल फिर से गूंजने लगा है,आखिर जन-आंदोलनों और 42 शहादतों की बुनियाद पर बने उत्तराखंड को 26 साल बाद भी अपनी स्थायी राजधानी क्यों नहीं मिल सकी?

राज्य गठन के बाद से अब तक सत्ता की मलाई चाटने वाले दोनों ही प्रमुख दलों, भाजपा और कांग्रेस पर गैरसैंण के मुद्दे को सिर्फ चुनावी ढाल बनाने और पहाड़ की जनता को ठगने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। स्थानीय जनता का मानना है कि जो गैरसैंण कभी राज्य की अस्मिता और खुशहाली का प्रतीक था, वह आज केवल एक ‘पिकनिक स्पॉट’ और सियासी पर्यटन का जरिया बनकर रह गया है।

उम्मीदों का उत्तराखंड⤵️

उत्तराखंड राज्य का इतिहास संघर्षों और ऐतिहासिक घोषणाओं से जुड़ा है. 15 अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने लाल किले की प्राचीर से उत्तराखंड राज्य के गठन की ऐतिहासिक घोषणा की थी.इसके बाद 15 अगस्त 1997 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने भी इसी संकल्प को दोहराया. 3 अगस्त 1998 को केंद्र की भाजपा नीत सरकार के मंत्रिमंडल ने राज्य गठन को मंजूरी दी, जिसके बाद 7 दिसंबर 1999 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्य विधेयक को अपनी हरी झंडी दी. संसदीय इतिहास में 1 अगस्त 2000 को लोकसभा और 10 अगस्त 2000 को राज्यसभा में यह विधेयक पारित हुआ. तत्कालीन राष्ट्रपति की ओर से 28 अगस्त को अधिसूचना जारी होने के बाद,आखिरकार 9 नवंबर 2000 को देश के मानचित्र पर उत्तराखंड का जन्म हुआ.सुरजीत सिंह बरनाला ने राज्य के प्रथम राज्यपाल के रूप में शपथ ली और नित्यानंद स्वामी सूबे के पहले मुख्यमंत्री बने.

वहीं,दशकों पुरानी पृथक राज्य की मांग पूरी होने पर आम उत्तराखंडी बेहद खुश था. लोगों को उम्मीद थी कि अब पहाड़ के नीति-नियंता अपने होंगे, भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी से मुक्ति मिलेगी, गांव-गांव तक खुशहाली आएगी और पलायन थमेगा. लेकिन 26 साल बाद आज जनहित के मुद्दे हाशिए पर हैं. उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) जैसे क्षेत्रीय दलों ने भी सत्ता में हिस्सेदारी तो पाई, लेकिन गैरसैंण को उसका हक दिलाने में वो भी नाकाम रहे,विकास की जगह आज सूबे के शांत गांवों तक शराब के ठेके पहुंच चुके हैं.

आयोगों के जाल में उलझा मुद्दा और 300 करोड़ का बुनियादी ढांचा

गैरसैंण को राजधानी बनाने के नाम पर सरकारों ने जनता के पैसों को पानी की तरह बहाया, लेकिन इच्छाशक्ति की कमी के कारण सिर्फ ‘आयोगों का खेल’ खेला गया। जहां एक तरफ कौशिक समिति ने गैरसैंण को राज्य के केंद्र में होने के कारण राजधानी के लिए सबसे उपयुक्त स्थान बताया था, तो वहीं इसके ठीक विपरीत दीक्षित आयोग ने भौगोलिक और तकनीकी कारणों का हवाला देकर इसे खारिज कर दिया था. इस राजनीतिक अनिर्णय के बीच भराड़ीसैंण में बुनियादी ढांचे के नाम पर अब तक लगभग 300 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की जा चुकी है. इस निर्माण कार्य की नींव साल 2014 में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल, विधानसभा उपाध्यक्ष अनसूया प्रसाद मैखुरी और पूर्व कांग्रेसी नेता सतपाल महाराज ने रखी थी. जून 2014 में करीब 30 एकड़ भूक्षेत्र में 106 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से निर्माण कार्य शुरू हुआ था.गैरसैंण के भराड़ीसैंण में स्थायी विधानसभा भवन बनने के बाद पहला सत्र हरीश रावत सरकार में 17 नवंबर 2016 को आहूत हुआ था. वहीं, 4 मार्च 2020 को तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भराड़ीसैण से विधानसभा बजट सत्र के दौरान गैरसैंण को सूबे की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया था। इसके बाद 8 जून 2020 को राज्यपाल की मंजूरी के बाद नोटिफिकेशन जारी किया गया था। वहीं,दूसरी ओर 4 मार्च 2021 को विधानसभा बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गैरसैंण को उत्तराखंड की तीसरी कमिश्नरी बनाये जाने की घोषणा की.लेकिन नेतृत्व परिवर्तन के बाद 9 अप्रैल 2021 को तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत कैबिनेट ने कमिश्नरी के इस निर्णय को स्थगित कर दिया।

वर्तमान में,भराड़ीसैंण विधानसभा परिसर 130 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें से 8 एकड़ में मुख्य भव्य विधानसभा भवन निर्मित है। इसके अलावा परिसर में शानदार विधायक आवास, मुख्यमंत्री निवास, मंत्रियों के बंगले, ऑफिसर हॉस्टल और कर्मचारी आवास बनकर तैयार हो चुके हैं। इसी परिसर में 65 एकड़ भूमि सचिवालय निर्माण के लिए भी प्रस्तावित की गई है, लेकिन विडंबना देखिए कि मिनी सचिवालय के लिए शुरुआती काम के लिए साल 2015 में ही 3 करोड़ रुपये की पहली किस्त भी जारी कर दी गई थी लेकिन निर्माण कार्य आज तक शुरू ही नहीं हो सका है.

सत्र के नाम पर पैसों की बर्बादी बंद हो,गैरसैंण को स्थायी राजधानी व जिला घोषित करे सरकार

27 अक्टूबर से शुरू हो रहे इस आगामी सत्र को लेकर वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी सुरेश कुमार बिष्ट ने कहा कि, सरकारें साल में केवल एक या दो बार सत्र आयोजित करने के नाम पर करोड़ों रुपये का सरकारी धन बर्बाद करती हैं. नेता और नौकरशाह यहां सिर्फ ‘सियासी पिकनिक’ मनाने और पहाड़ों की ठंडी हवा का आनंद लेने आते हैं। अगर इसी पैसे का सदुपयोग पर्वतीय क्षेत्रों में अस्पतालों, स्कूलों और सड़कों को सुधारने में किया जाता, तो पहाड़ का आज यह हाल न होता.सुरेश बिष्ट ने कहा कि,आज तक जितने भी सत्र गैरसैंण में हुए हैं राज्य आन्दोलनकारियों सहित क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों द्वारा बड़ी आशा के साथ अपने क्षेत्र की आवश्यक समस्याओं से मुख्यमंत्री सहित सभी विभागीय मंत्रियों से व्यक्तिगत संपर्क कर मांग पर दिए गए। कहा कि,ताज्जुब की बात यह है कि इन मांगों में एक भी मांग आज तक पूरी नहीं हुई है। जो इस सत्र की वास्तविकता को भी प्रदर्शित करता है.जिससे जनप्रतिनिधि भी अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.

क्षेत्रीय विधायक अनिल नोटियाल का कहना है कि, मेरे द्वारा लगातार गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित करने व जिला बनाये जाने की मांग सरकार के सम्मुख विधानसभा सदन के व अन्य माध्यमों से रखी गयी है, कहा कि, गैरसैंण के विकास को लेकर अवस्थापना सुविधायें लगातार बढ़ रही हैं और हम स्थायी राजधानी और जिले की और भी आगे बढ़ रहे हैं।

कांग्रेस नेता व नगर पंचायत अध्यक्ष मोहन भंडारी ने कहा कि,सरकार ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी तो बना दिया है,लेकिन यहां से ग्रीष्मकाल में सरकार का संचालन नहीं होता है, कही ना कहीं सरकार को गैरसैंण में दो दिन सत्र चलाने की बजाय अधिक समय तक यहां से सरकार का संचालन करना चाहिए और यहां पर सचिवालय व अन्य विभागों को स्थापित कर पहले जिले और बाद में स्थायी राजधानी की ओर कदम बढ़ाने चाहिए।

वहीं,इस बार क्षेत्र के लोगों,जनप्रतिनिधियों और आंदोलनकारियों ने भी सरकार के सामने एक नई और बड़ी मांग रख दी है। उनकी मांग है कि सत्र के दौरान केवल औपचारिकताएं पूरी न की जाएं, बल्कि सरकार इसी सत्र में ऐतिहासिक फैसला लेते हुए गैरसैंण को पृथक जिला घोषित करे।

गैरसैंण की जनता का मानना है कि गैरसैंण को जिला बनाए जाने से यहां प्रशासनिक सुदृढ़ता आएगी, बुनियादी सुविधाओं का विकास होगा और पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं का वास्तविक समाधान हो सकेगा। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट इस सत्र में गैरसैंण वाशियों की इस जायज मांग पर क्या रूख अपनाती है या फिर यह सत्र भी हर बार की तरह सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी व घोषणाओं तक ही सीमित रह जाएगा?

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