गैरसैंण विधानसभा सत्र पर टिकी पहाड़ की निगाहें,छठी विधानसभा के चुनावों से पहले बड़े फैसलों की उम्मीद।
सचिवालय निर्माण व परिक्षेत्र विकास के लिए घोषित 25 हजार करोड की धनराशि आज भी सपना।
गैरसैंण वासियों को जिला बनने की उम्मीद,गैरसैंण रेल मार्ग, झील निर्माण, केन्द्रिय विधालय व भरसार के उच्चीकरण का भी मुद्दा
मेहलचौरी (गैरसैंण)- 25 अक्टूबर 2026
रिपोर्ट:- प्रेम संगेला
उत्तराखंड की पांचवीं विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने में महज चार माह ही शेष बचे हैं,लिहाजा चुनावी माहौल के बीच होने जा रहे पांचवी विधानसभा के आखिरी सत्र का माहौल सदन से लेकर सडक तक चुनावी रंग में रंगा नजर आएगा। उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के भराड़ीसैंण में सर्द मौसम के बीच 27 अक्टूबर से प्रस्तावित विधानसभा सत्र में सियासी सरगर्मियां चरम पर रहने की उम्मीद है।
अब जबकि छठी विधानसभा के गठन के लिए होने वाले चुनावों में महज चार माह का ही समय बचा है तो ऐसे में भराड़ीसैण के सदन से लेकर गैरसैंण की सड़कों पर हंगामा होना भी तय है। जिसको लेकर धामी सरकार 2026 -27 के 111703 करोड के भारी भरकम बजट के साथ ही अतिरिक्त वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए 7 हजार करोड का अनुपूरक बजट लाकर सरकार की विकासीय योजनाओं पर खर्च करने की क्षमता ओर वित्तिय कार्यकुशलता की धमक दिखाने की कोशिश करेगी। तो वहीं, दूसरी ओर विपक्षी कांग्रेस सरकार को पहाड़ के हितों से जुड़े मुद्दों सहित अंकिता भंडारी हत्याकांड,गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने,शिक्षा ,स्वास्थ्य ,सडक , बेरोजगारी ,खनन,शराब नीति व कानून व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सडक से लेकर सदन तक घेरने की कोशिश करेगी।
वहीं इस बार सांगठनिक रूप से बेहतर स्थिति में नजर आ रही उत्तराखंड क्रांति दल भी स्थायी राजधानी,मूल निवास,भू कानून व पहाड की अस्मिता बचाए रखने जैसे मुदों को लेकर सडक पर आक्रामक रूख अपनाएगी.हालांकि,चुनावों से पूर्व आयोजित इस आखिरी सत्र में सरकार पर अनुपूरक बजट ओर 8 विधेयकों को पास कराने के अलावा खुद को पहाड़ ओर गैरसैंण हितैषी साबित कर राजनैतिक बढत लेने का भी आखिरी मौका होगा। जिसको लेकर भी धामी सरकार से बड़े निर्णयों की उम्मीद की जा रही है।
अब तक भाजपा का पलड़ा कांग्रेस से भारी
उत्तराखंड के अलग राज्य के रूप में गठन से लेकर गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किए जाने तक के घटनाक्रम में अब तक भाजपा, कांग्रेस से 20 जरूर साबित हुई है, लेकिन स्थायी राजधानी पर फैसला न ले पाने के साथ ही गैरसैंण क्षेत्र के विकास की कोई ठोस योजना तैयार न कर पाना भाजपा सरकार के लिए भी सरदर्द बना हुआ है।
उल्लेखनीय है की 9 नवम्बर 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला,जिसके बाद 4 मार्च 2020 को त्रिवेंद्र रावत ने गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर जरूर बढत बनायी थी,लेकिन ग्रीष्मकालीन राजधानी परिक्षेत्र के योजनागत विकास के लिए उनकी 25 हजार करोड की घोषणा 6 वर्षों बाद भी धरातल पर नहीं उतर पायी।
वहीं कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में 3 नंवबर 2012 को गैरसैंण में पहली बार केबिनेट बैठक ,तो 9 नवम्बर 2013 को विधानसभा निर्माण का भूमिपूजन किया गया। जिसके बाद 9 जून 2014 में हरीश रावत सरकार ने टेटों में विधानसभा सत्र चलाकार गैरसैंण को चर्चाओं में ला दिया था। साथ ही गैरसैंण में आधारभूत ढांचे के विस्तार और सचिवालय की स्थापना से जुड़ी घोषणाएं की गयी थी।
हालांकि ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा के बाद भी क्षेत्र में विकास की गति को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यहां से गुजरने वाले ज्योलिकोट- कर्णप्रयाग राजमार्ग के चौड़ीकरण के साथ ही नजदीकी जिलों को जोडने के लिए नई सड़कों का निर्माण,स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षण संस्थानों की दशा व रोजगार को लेकर भी नाराजगी दिखायी देती है ।
चुनावी वर्ष में बड़े फैसलों की उम्मीद
विधानसभा चुनाव से पहले आयोजित हो रहे इस सत्र में गैरसैंण क्षेत्र को लेकर कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं होने की संभावनाएं जताई जा रही हैं । गैरसैंण को जिला बनाये जाने की मांग ,2004 में भैरवगढी मंदिर परिसर में सिलंगा निवासी विक्रम ब्रह्मचारी की सप्ताहभर की भूख हड़ताल से शुरू हुई थी। साथ ही ग्रीष्मकालीन राजधानी परिक्षेत्र के विकास को पूर्व में घोषित 25 हजार करोड की धनराशि पर निर्णय लेने,सचिवालय निर्माण,रामनगर-गैरसैंण रेल मार्ग निर्माण,नजदीकी जिलों की दूरी घटाने को सुरंग सहित सडकों का निर्माण, केंद्रीय विद्यालय की स्थापना,गैरसैंण में प्रस्तावित झील निर्माण, हरगढ़ स्थित भरसार के उच्चीकरण, दूधातोली को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर आमजन सरकार से निर्णय लिए जाने की आश लगाए बैठी है।
भराड़ीसैंण में आयोजित होने वाला यह विधानसभा सत्र सरकार और विपक्ष, दोनों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। एक तरफ कांग्रेस और उक्रांद स्थायी राजधानी सहित स्थानीय मुद्दों पर सरकार को घेरती नजर आएगी तो वहीं धामी सरकार के सामने चुनाव से पहले पहाड़ की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती होगी। ऐसे में सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार अनुपूरक बजट के साथ ही गैरसैंण और पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को लेकर कोई बड़ा निर्णय लेती है ,या फिर पिछले सत्रों की तरह इस बार का सत्र भी सरकारी तामझाम के बीच भारी भरकम खर्च,सदन का हंगामा ओर सडक के संग्राम तक ही सिमटा रहेगा।
