नेपाली मूल के लोगों के सरकारी व वन भूमि पर अतिक्रमण और अवैध दस्तावेज बनाने पर हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती,सरकार से पूछे सवाल।

नेपाली मूल के लोगों के सरकारी व वन भूमि पर अतिक्रमण और अवैध दस्तावेज बनाने पर हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती,सरकार से पूछे सवाल।

नैनीताल- 21 मई 2026

नेपाली मूल के लोगों की ओर से नैनीताल के आस पास सरकारी जमीन और वन विभाग की भूमि पर अतिक्रमण कर गलत तरीके से भारत की नागरिकता से जुड़े दस्तावेज तैयार करने के मामले पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ती सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए सरकार से यह बताने को कहा कि ये किस पॉलिसी के अंतर्गत भारत में रह रहे हैं और ये लोग कैसे भूमि खरीद रहे हैं? तीन हफ्ते के भीतर कोर्ट को बताएं।

बुधवार को हुई सुनवाई पर सरकार ने शपथ पत्र पेश कर कहा कि साल 1950 की नियमावली के तहत भारतीय नेपाल में और नेपाली लोग भारत में रह सकते हैं,साथ ही वो रोजगार कर सकते हैं। जिसका विरोध करते हुए याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि नियमावली के अनुसार, अगर कोई नेपाली भारत में जमीन लेता है, तो वो आरबीआई के माध्यम से खरीदी जाएगी। भारतीयों को ये सुविधा नेपाल में नहीं मिली हुई है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि किस नीति के आधार पर रह रहे हैं? उसे पेश करें।

क्या है पूरा मामला?⤵️

दरअसल, नैनीताल निवासी पवन जाटव ने नैनीताल हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है जिसमें उन्होंने कहा है कि बीते कई साल से नेपाल से आए लोगों ने नैनीताल शहर और खुरपाताल के तोक खाड़ी स्थित बजून चौराहे के पास सरकारी व नजूल भूमि पर कब्जा करके आवासीय निर्माण कर लिया है जिसमें करीब 25 परिवार शामिल हैं। इन लोगों ने ना ही कोई नागरिकता हासिल करने के लिए प्रार्थना पत्र लगाया है, न ही किसी तरीके से भारत देश की नागरिकता हासिल की। इनकी ओर से अवैध तरीके से यहां के दस्तावेज बनाकर जैसे आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, ड्राइ‌विंग लाइसेंस, स्थाई निवास प्रमाण पत्र,राशन कार्ड, स्वास्थ्य सेवाएं कार्ड बनाकर सरकारी योजनाओं का लाभ लिया जा रहा है।

साथ ही वोटर लिस्ट, पैन कार्ड, आधार कार्ड बनाकर वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराकर पानी-बिजली के कनेक्शन आदि अवैध तरीके से हासिल भी कर लिए हैं। इस संबंध में कई बार इसकी शिकायत जिला प्रशासन और राज्य सरकार के उच्चाधिकारियों से की हई, लेकिन उनकी शिकायत का कोई निराकरण नहीं हुआ।

इससे क्षुब्ध होकर उनको न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। जनहित याचिका में उन्होंने कोर्ट से प्रार्थना की है कि इस तरह की अवैध गतिविधिओं पर रोक लगाई जाए। जिन अधिकारियों ने उन्हें ये प्रमाण पत्र जारी किए हैं, उनके खिलाफ भी विभागीय व दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए जाएं।

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