जानलेवा मोबाइल गेम:-गाजियाबाद की घटना के बाद उत्तराखंड में चर्चाएं तेज,डिजिटल के जाल में फंसते जा रहे है बच्चे।

जानलेवा मोबाइल गेम:-गाजियाबाद की घटना के बाद उत्तराखंड में चर्चाएं तेज,डिजिटल के जाल में फंसते जा रहे है बच्चे।

उत्तराखंड-07 फरवरी 2026

उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद में दिल दहला देने वाली घटना हाल ही में सामने आई है। जिसमें गाजियाबाद की एक सोसायटी में रहने वाली तीन नाबालिग बहनों 9वीं मंजिल से कूदकर अपनी जान दे दी है। जिसके बाद से ही ये मामला पूरे देश भर में चर्चाओं का विषय बना हुआ है। साथ ही इस मामले ने मोबाइल एडिक्शन, ऑनलाइन गेम और डिजिटल इन्फ्लुएंस के खतरनाक असर पर एक बार फिर बड़ी बहस छेड़ दी है। दरअसल, कुछ साल पहले भी ऑनलाइन पब-जी (PUB G) ऑनलाइन गेम खेलने वाले बच्चों से जुड़े मामले सामने आए थे। जिस दौरान इस गेम ने बच्चों को खुद की नुकसान पहुंचाने के साथ ही क्राइम करने को मजबूर कर दिया था।

ऐसा ही कुछ मामला उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में सामने आने के बाद देश भर में चर्चाओं का विषय बना हुआ है। इसी क्रम में उत्तराखंड राज्य में भी ऑनलाइन मोबाइल गेम को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। डिजिटलाइजेशन के इस दौर में स्थिति यह है कि ऑनलाइन पढ़ाई के साथ- साथ बच्चों को मोबाइल यूज़ करने की लत लगती जा रही है या फिर यु कहे कि लत लग गई है। जो अभिभावकों के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। साल 2020 में वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण के दस्तक के बाद डिस्टलाइजेशन का एक ऐसा नया युग शुरू हुआ जब पढ़ाई से लेकर हर काम अब डिजिटल होते चले गए हैं। हालांकि, ये जीतना जरूरी है उतनी ही सावधानियां भी बरतने की जरूरत है।

वही उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में हुई इस घटना के उपरांत उत्तराखंड में भी मोबाइल गेमिंग को लेकर सतर्कता पर बरतनी शुरू कर दी है राजधानी देहरादून के जिलाधिकारी नवीन बंसल ने शुक्रवार को जिले के सभी स्कूलों को तत्काल एडवाइजरी जारी कर दी है जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है की स्कूल में डिजिटल ,व्यवहार ,गेमिंग, आदतों समिति मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सख्त निगरानी अपनाए वही अभिभावको को भी पूरी तरीके से जागरूक करें।

इस पूरे मामले पर देहरादून के मनोचिकित्सक डॉ मुकुल शर्मा ने कहा कि गाजियाबाद में आया ये मामला बेहद ही दुखद है। वर्तमान समय में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मौजूद अधिकांश मोबाइल गेम अच्छे नहीं है। खासकर ऐसे गेम जो टास्क बेस्ट होते हैं। पहले भी तमाम तरह के ऐसे मामले देश के तमाम क्षेत्रों में सामने आ चुके हैं, जिसके चलते स्कूल, कॉलेज तमाम संस्थाओं ने इस तरह के मोबाइल गेम पर रोक भी लगाई है। लेकिन PUB- G जैसे गेम अभी भी इंटरनेशनल डोमेन पर मौजूद है। जिस पर अभी तक सही ढंग से बैन नहीं लग पाया है। साथ ही बताया कि लगातार गेम खेलने से हमारे सोचने समझने की क्षमता खत्म हो जाती है, साथ ही एक तरह से गेम के एडिट हो जाते हैं और उसके निर्देशों का पालन करने लगते हैं। ऐसे में अभिभावक की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि इस पर विशेष ध्यान दें कि उनका बच्चा क्या कर रहा है मोबाइल पर क्या देख रहा है या मोबाइल पर कौन सा गेम खेल रहा है। अगर पेरेंट्स को इसकी जानकारी होगी तो इस तरह के मामलों में कमी आएगी।

तेजी से डिजिटल होती दुनिया में मोबाइल फोन और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बच्चों से लेकर बड़ों तक की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इसके बढ़ते और अनियंत्रित उपयोग को लेकर अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंता जाहिर कर रहे हैं। क्योंकि, डिजिटल और मोबाइल स्क्रीन का लत बच्चों पर नकारात्मक असर डाल रहा है। और इसका असर खासकर बच्चों में उनके व्यवहार पढ़ाई और पारिवारिक संबंधों में देखा जा रहा है। बच्चों में लगातार बढ़ रही मोबाइल की लत के सवाल पर देहरादून के सीएमओ डॉ मनोज कुमार शर्मा ने कहा कि उन्होंने साइकेट्रिस्ट डॉक्टरों और संबंधित फाउंडेशन के विशेषज्ञों से भी चर्चा की है। सभी का मानना है कि ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और खासकर रील्स देखने की आदत बच्चों में तेजी से बढ़ी है। इसके कारण बच्चे, पढ़ाई से भटक रहे हैं और सामाजिक एवं पारिवारिक संवाद में कमी आ रही है।

उत्तराखंड बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. गीता खन्ना ने कहा कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में तीन नाबालिक बच्चियों ने 9वीं मंजिल से कूद कर अपनी जान दे दी, क्योंकि उनके पिता ने बच्चियों से उनका मोबाइल छीन लिया था। यह मामला दो महत्वपूर्ण बिंदुओं को इंगित करती है। क्योंकि बच्चों में लगातार इन टॉलरेंस के मामले बढ़ते जा रहे हैं, जिसके तहत कोई भी ना उन्हें बर्दाश्त नहीं है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि बच्चों को उतनी चीजे ही दे ताकि उन्हें ना सुनने की आदत बनी रहे। इसके साथ ही वर्तमान समय में बच्चों में डिजिटल लत भी तेजी से बढ़ती जा रही है। डिजिटल आपसे बातचीत और अपने ज्ञानवर्धन के लिए बनाया गया था लेकिन आज यही डिजिटल परिवारों को तोड़ रहा है। लिहाजा बच्चों की आदत को सुधारने के लिए पेरेंट्स को भी डिजिटल गुलामी से बाहर आना होगा। साथ ही बच्चों के साथ बातचीत करने और उन्हें समय देने की जरूरत है।

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