9 दिन से भटक रहे बेटे को मिला न्याय,36 घंटे के भीतर कानपुर सीएमओ की पलट गई पहली रिपोर्ट।

9 दिन से भटक रहे बेटे को मिला न्याय,36 घंटे के भीतर कानपुर सीएमओ की पलट गई पहली रिपोर्ट।

कानपुर (उत्तरप्रदेश)- 25 मई 2026

आखिरकार 9 दिन से भटक रहे बेटे को मां के लिए न्याय मिल ही गया। महज 36 घंटे के भीतर कानपुर सीएमओ की पहली रिपोर्ट पलट गई। इसमें डाक्टरों को बचाने के आरोप लग रहे थे। अब दूसरी रिपोर्ट के बाद शहर के दोनों बड़े अस्पतालों के प्रबंधन पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश दे दिए गए हैं।

कानपुर में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) के जवान विकास सिंह की मां का इलाज के दौरान लापरवाही के कारण हाथ काटे जाने का मामला देश में सुर्खियों में है। थर्माकोल के आइस-बॉक्स में मां का कटा हाथ लेकर न्याय के लिए भटक रहे जवान के समर्थन में जब कमांडेट के साथ उनके साथी जवान पुलिस दफ्तर पहुंचे तो इंसाफ की उम्मीद जगी। 36 घंटे के भीतर पहली रिपोर्ट पलट गई और पुलिस आयुक्त ने कृष्णा और पारस अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए।

आईटीबीपी जवान विकास सिंह की मां निर्मला देवी का इलाज के दौरान हाथ काटे जाने का मामले ने सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए। अब यह केस महज एक मेडिकल लापरवाही का केस नहीं रह गया है, बल्कि स्वास्थ्य विभाग, निजी अस्पतालों, प्रशासनिक जवाबदेही और सुरक्षा बलों की संवेदनशीलता से जुड़ा मुद्दा बन गया है।

रविवार देर रात आई जांच रिपोर्ट ने नया सवाल खड़ा कर दिया है। 24 घंटे पहले स्वास्थ्य विभाग की जिस टीम ने पुलिस आयुक्त को दी रिपोर्ट में कृष्णा अस्पताल और पारस अस्पताल को क्लीन चिट दे दी थी। उसकी नए सिरे से हुई जांच में 36 घंटे बाद ही दोनों अस्पतालों को दोषी बना दिया गया है।

सीएमओ की ओर से गठित जांच टीम की अस्पष्ट रिपोर्ट में हाथ काटे जाने का कारण स्पष्ट नहीं किया गया। वहीं, यह भी सामने आया है कि कृष्णा अस्पताल में जवान की मां के हाथ की समस्या को किसी भी सर्जन को नहीं दिखाया गया। हालांकि अस्पताल प्रबंधन इससे इन्कार कर रहा है। कल्याणपुर-शिवली रोड पर संचालित ज्यादातर अस्पतालों के बोर्ड में नामचीन डाक्टरों के नाम लिखे होते हैं जबकि मौके पर कोई भी डाक्टर नहीं मिलता है। ऐसा ही कुछ मामला आईटीबीपी जवान की मां का हाथ काटे जाने की घटना में सामने आया।

सीएमओ की ओर से पुलिस आयुक्त को दी गई रिपोर्ट में कृष्णा अस्पताल में बिना सर्जन की सलाह के हाथ में संक्रमण से ग्रसित मरीज को दूसरे अस्पताल जाने दिया गया जबकि इतने बड़े अस्पताल में कई सर्जन होने चाहिए थे। इस बारे में कृष्णा अस्पताल में प्रबंधतंत्र से जुड़े योगेंद्र यादव ने पक्ष रखते हुए कहा कि हमारे अस्पताल में महिला के चेस्ट का इलाज हुआ है। हाथ वाली समस्या हमारे अस्पताल में नहीं हुई है। सर्जन की टीम अस्पताल में रहती है।

इस प्रकरण में आईटीबीपी के अधिकारी अपने जवान के लिए प्रतिबद्ध दिखे। जवान ने जब अधिकारियों को बताया कि उसकी सुनवाई नहीं हो रही है तो लखनऊ से सोमवार को लाइजनिंग अफसर अर्पित कुमार को कानपुर भेजा गया। वह जवान को लेकर पुलिस आयुक्त कार्यालय पहुंचे। उन्होंने कृष्णा हास्पिटल पर गंभीर आरोप लगाए। बताया कि यह अस्पताल पहले आईटीबीपी में इम्पैनल्ड (कैशलेस इलाज) था, पूर्व में दो जवानों की मृत्यु लापरवाही से हो चुकी है, जिसके बाद उसे हटा दिया गया था।

सीएमओ की गठित डाक्टरों की टीम ने रविवार को दोबारा जांच शुरू की। टीम ने कृष्णा हास्पिटल में जवान की मां का इलाज कर रहे डाक्टरों के बयान दर्ज किए। इस दौरान सामने आया कि मरीज की नसों में थक्के जमने से खून का प्रेशर बढ़ रहा था, जिससे समस्या हुई। अगर सही समय पर वैस्कुलर सर्जन से सलाह लेकर हाथ में कट लगा दिया जाता तो हाथ काटने की स्थिति न बनती।

जवान के भाई रोडवेजकर्मी आकाश सिंह ने सीएमओ पर मां का इलाज करने वाले डाक्टरों को बचाने के लिए जांच रिपोर्ट में खेल करने की बात कही। कहाकि अगर न्याय नहीं मिला तो मुख्यमंत्री के जनता दरबार में गुहार लगाएंगे। उन्होंने बताया कि मां को स्वास्थ्य लाभ है। सोमवार को डाक्टर उन्हें डिस्चार्ज कर सकते हैं।

टाटमिल स्थित कृष्णा अस्पताल में मां के इलाज में बेहद लापरवाही बरती गई है। मां को भर्ती कराने के अगले दिन ही उनका हाथ पहले काला पड़ा, फिर सूजन आ गई। डाक्टरों को बताया तो उन्होंने एक-दो दिन में ठीक होने की बात कही, लेकिन मां के हाथ में फफोले पड़ गए। यह देख भाई विकास को बताया। भाई ने अफसरों को जानकारी दी तो वह भी नाराज हुए कि पारस अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए था। इसके बाद 14 मई की शाम तक मां का हाथ सही नहीं हुआ तो रात लगभग आठ बजे उन्हें पारस अस्पताल में भर्ती करा दिया पर दिक्कत बढ़ती गई।

17 मई को डाक्टर को मां का दाहिना हाथ कलाई के पास से काटना पड़ा था। बड़ी बात ये है कि इलाज में लापरवाही के बाद भी सीएमओ ने डाक्टर को बचाने के लिए गोलमोल जवाब जांच रिपोर्ट में लिखकर क्लीनचिट दे दी। हालांकि पुलिस अधिकारियों ने मामले में दोबारा जांच कराने की बात कही है। अगर दोबारा जांच में भी डाक्टरों की लापरवाही नहीं मिली तो वह मुख्यमंत्री के जनता दरबार में गुहार लगाने जाएंगे।

विकास सिंह ने हाल ही में कानपुर में नया भवन बनाया है। उनके नए भवन में छत पड़नी थी, जिसमें पूजा करने के लिए उन्होंने 10 मई को गांव से मां निर्मला सिंह को बुलाया था। छोटे भाई आकाश सिंह ने बताया कि मां सांस लेने में तकलीफ होने पर अस्पताल में भर्ती किया गया। लेकिन चिकित्सकों ने हाथ काट दिया। पारिवारिक भाई पंकज सिंह, विकास सिंह के दादा चंद्रमोहन, पिता इंद्रमोहन सिंह व चचेरे भाई नीलेश सिंह ने कहा कि कोई भी बीमारी नहीं थी, अचानक हाथ काटने की नौबत कैसे आई यह समझ से परे है। परिवार चाहता है कि दोषी डाक्टर व अस्पताल के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो, जिससे किसी अन्य मरीज की जिंदगी से खिलवाड़ न हो सके।

20 मई को विकास अपनी मां का कटा हाथ लेकर इंसाफ के लिए पुलिस आयुक्त कार्यालय पहुंचे थे। पुलिस आयुक्त ने प्रकरण में सीएमओ से जांच रिपोर्ट मांगी थी। पुलिस आयुक्त के अनुसार, जांच रिपोर्ट में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। पूरी रिपोर्ट संभावनाओं पर आधारित है, जिसमें कहा गया है कि हाथ का संक्रमण थर्मा एम्बोलिज्म (खून का थक्का जमना) की वजह से हो सकता है। यह स्थिति कैसे बनी, रिपोर्ट में इस बात का जिक्र नहीं है।

जवान विकास सिंह 19 मई को पुलिस आयुक्त कार्यालय पहुंचा। वहां आरोप लगाया था कि अस्पताल की लापरवाही की शिकायत लेकर वह थाना रेल बाजार के चक्कर काटता रहा लेकिन पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। उसे सीएमओ के पास जाने को कहा गया। वह सीएमओ कार्यालय भी गया लेकिन वहां भी सुनवाई नहीं हुई। आइस बाक्स में मां का कटा हाथ सुरक्षित करके वह एक दर से दूसरे दर पर भटक रहा है, मगर कोई सुनने को तैयार नहीं है। मजबूरन, मां का कटा हुआ हाथ लेकर सीधे पुलिस आयुक्त कार्यालय जा पहुंचा। पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल से मिला, जिसके बाद उन्होंने सीएमओ को मेडिकल जांच के लिए कहा है।

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